पिंड-ब्रह्मण्ड, पंचमहाभूत और रसतत्व रहस्य

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जगदीश्वर ने आदिशक्ति अंशीभूता प्रकृति की सहायता से पंच महाभूतों के नाम में भूमि, गगन, वायु, अग्नि, जल का समावेश कर मानव देह की रचना की और उसे सम्पूर्ण योग्यताएं और शक्तियां देकर इस संसार में स्वच्छता पूर्वक जीवन बिताने के लिए भेजा है। इन पंच तत्त्वों के संचालन तथा समन्वय से पिंड अर्थात शरीर नियंत्रित और इसी में स्थित चेतना अर्थात् प्राणशक्ति से उत्पन्न विद्युत शक्ति मस्तिष्क के अंदर प्रवाहित होकर, इसी में स्थित 2.4 से 3.3 अरब कोषों को नियमित रूप में सक्रिय करती है। ये कोष अति सूक्ष्म रोम के सदृश एवं कंघे के दांतों की तरह पंक्ति में जमे हुए होते हैं।।

मस्तिष्क के कोष पांच प्रकाश के होते हैं और पंच महाभूतों; यथा– पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश का प्रतिनिधित्व करते हैं। मूलरूप से ये मूल तत्व सब शरीर में बराबर मात्रा में रहने चाहिए। जब इन में थोड़ीसी भी गड़बड़ी होती है या किसी एक तत्व में त्रुटि जनित वृद्धि हो जाते है, तब दूसरे तत्व समूह में भी गड़बड़ी आती है और परिणामतः शरीर में रोग उत्पन्न होना स्वाभाविक होते हैं।।

पंचतत्वों का विश्लेषण :

विज्ञानी मनीषियों ने इन पंच महाभूतों का इस प्रकार विश्लेषण किया है; यथा– पृथ्वी तत्व असीम सहनशीलता का द्योतक है और इससे मनुष्य धन- धान्य से परिपूर्ण होता है। इसके त्रुटिपूर्ण होने से लोग स्वार्थी हो जाते हैं।। जल तत्व शीतलता प्रदान करता है। इन में विकार आने से सौम्यता कम हो जाती है।। अग्नि तत्व विचार शक्ति में सहायक बनता है और मस्तिष्क के भेद को परखने वाली शक्ति को सरल बनाता है। यदि इसी में त्रुटि आ जाए, तो मनुष्य के मन में सोचने की शक्ति का ह्रास होने लगता है।। वायु तत्व मानसिक शक्ति तथा स्मरण शक्ति की क्षमता व ताकत को पोषण प्रदान करता है। अगर इसी में विकार आने लगे, तो स्मरण शक्ति कम होने लगती है।। आकाश तत्व शरीर में आवश्यक संतुलन बनाए रखता है। इसी में विकार आने से शारीरिक संतुलन बिगड़ जाता है।। आयुर्वेद में पंचतत्व : ———————— चरक व शुश्रुत संहिता के अनुसार पांच तत्वों के समायोजन से स्वाद भी बनते हैं; यथा– “मीठा”– पृथ्वी + जल, “खारा”– पृथ्वी + अग्नि, “खट्टा”– जल + अग्नि, “तीखा”– वायु + अग्नि, “कसैला”– वायु + जल, “कड़वा”– वायु + आकाश। स्वरोदय विशेषज्ञों ने इस रसतत्व को अपने अंदर संतुलित रखकर खुदको निरोग रखने की सदा चेष्टित रहते हैं।। मनुष्य के मुख में बदलते हुए स्वाद को आधार बनाकर, आयुर्वेद का इस पंचतत्व से सम्बंधित “रसतत्व” निर्धारित। किसी भी रोग- व्याधि निदान परिप्रेक्ष में रोगी के मुख का स्वाद को आधार मानकर, प्रोक्त “रसतत्व” के अनुसार शरीर में घटित तत्व- असंतुलन को चिकिच्छक आयुर्वेद- तरीके में दवाई देकर चिकिच्छा करते हैं।। कुछ अभिज्ञ सामुद्रिक शास्त्री भी मनुष्य के पांच अंगुली से पांच तत्व को परीक्षा कर, रोग सम्बंधित फलादेश करते हैं।।

साभार- ।।आचार्य डॉ0 विजय शंकर मिश्र:।।

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