जनेकृविवि में सतत खेती में उभरती प्रौद्योगिकियां और नवाचार विषय पर प्रशिक्षण आयोजित
21 दिवसीय ट्रेनिंग वैज्ञानिकों के लिए मील का पत्थर सिद्ध होगी- कुलपति डॉ. पी. के. मिश्रा
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर स्थित मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायनशास्त्र विभाग के अंतर्गत एडवांस्ड फैकल्टी ट्रेनिंग सेंटर जबलपुर द्वारा “सतत खेती में मिट्टी के स्वास्थ्य के प्रबंधन के लिए उभरती प्रौद्योगिकियां और नवाचार” विषय पर 5 फरवरी से 21 दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण का उद्घाटन कुलपति डॉ. प्रमोद कुमार मिश्रा के मुख्यआतिथ्य एवं संचालक शिक्षण डॉ. अभिषेक शुक्ला की अध्यक्षता में किया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में संचालक अनुसंधान सेवाएं डॉ. जी. के. कौतु, संचालक विस्तार सेवाएं डॉ. टी. आर. शर्मा और अधिष्ठाता कृषि महाविद्यालय, जबलपुर डॉ. जयंत भट्ट विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचासीन रहे। मुख्यअतिथि की आसंदी से कुलपति डॉ. पी. के. मिश्रा ने अपने उद्बोधन में कहा कि 21 दिवसीय यह ट्रेनिंग वैज्ञानिकों के लिए मील का पत्त्थर सिद्ध होगी। देशभर से आए आप सभी प्रशिक्षाणार्थी यहां से जो कुछ भी सीख कर जाए, अपने-अपने क्षेत्रों के कृषकों को मृदा स्वास्थ्य एवं टिकाऊ खेती के लिए प्रेरित करें। आपने कहा कि आज के आधुनिक युग में ड्रोन, नैनो-टेक्नोलॉजी और नैनो-उर्वरक, बायोचार, सूक्ष्मजीव इंजीनियरिंग सहित अन्य मिट्टी स्वास्थ्य के लिए प्रमुख रूप से उभरती प्रौद्योगिकियां है। जिनके इस्तेमाल से कृषि एवं मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर करने में मददगार साबित होगी।संचालक शिक्षण डॉ. अभिषेक शुक्ला ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि उपजाऊ मिट्टी पौधों, जानवरों और मानव जीवन का पोषण करती है। लेकिन मिट्टी का अत्यधिक दोहन अधिकांश अक्षम कृषि पद्धतियों, पनों की कटाई, वैश्विक तापमान और सतही कटाव के लिए जिम्मेदार है, लिहाजा मिट्टी की मरम्मत और उसके प्रदर्शन में सुधार के लिए प्रौद्योगिकी की आवश्यकता है। माइकोबायोम इंजीनियरिंग, बायोइन्फॉर्मेटिक्स और सटीक कृषि किस प्रकार मिट्टी और उसकी स्थिरता में सुधार कर सकते हैं। ऐसे विभिन्न बिंदुओं को लेकर 21 दिवसीय प्रशिक्षण में विशेषज्ञों द्वारा महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की जाएगी।प्रशिक्षण कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि संचालक अनुसंधान सेवाएं डॉ. जी. के. कौतु ने अपने उद्बोधन में कहा कि मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन एक वैश्विक चिंता का विषय है, विशेष रूप से विकसित देशों में जहां कृषि उत्पादकता, जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं की स्थिरता खतरे में है। आपने कहा कि सटीक कृषि और डिजिटल प्रौद्योगिकियों का अनुप्रयोग संभवतः मृदा स्वास्थ्य के प्रबंधन में सबसे बड़ी उपलब्धियों में से है। इन तकनीकों ने मिट्टी की स्थिति का पता लगाने और उसमें सुधार करने के तरीकों में कांतिकारी बदलाव लाए है। ये सभी उपलब्ध संसाधनों के उपयोग को अनुकूलित करने के प्रयास में किए जाएं। आपने गौवंश को किसानों से ज्यादा से ज्यादा जोडने के लिए जोर दिया है। संचालक विस्तार सेवाएं डॉ. टी. आर. शर्मा ने कहा कि रासायनिक पदार्थों के उपयोग से मृदा मुर्दा होती जा रही है। हम सभी वैज्ञानिकों को मृदा को हेल्दी बनाने और प्राकृतिक खेती की ओर किसानों का रुझान बढ़ाने की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है, राज्य और केन्द्र सरकार भी इसे बढ़ावा देने के लिए प्रेरित कर रही है। लेकिन कार्बनिक पदार्थ की कमी, पोषक तत्वों का असंतुलन या मिट्टी का संघनन, के कारण फसलों की पैदावार में भारी गिरावट आई है। आपने कहा कि कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से नेचुरल फार्मिंग की ओर किसानों को प्रेरित किया जा रहा है।प्रशिक्षण कार्यक्रम में मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायनशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. बी.के. दीक्षित ने स्वागत उद्बोधन दिया और 21 दिवसीय ट्रेनिंग की रूपरेखा एवं महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की। प्रशिक्षण कार्यकम के उद्घाटन सत्र का संचालन विषय समन्वय डॉ. बी. एस. द्विवेदी और आभार प्रदर्शन विषय सह समन्वयक डॉ. जी. एस. टैगोर द्वारा किया गया।इस अवसर पर डॉ. एच.के. राय, डॉ. वाय.एम.शर्मा, डॉ. अमित उपाध्याय, डॉ. आर. के. साहू, डॉ. एफसी अमूले, डॉ. अभिषेक शर्मा, डॉ. शैलू यादव, श्री मधुकर, श्रीमति संगीता ठाकुर, श्री रविन्द्र कुमार, श्री धर्मेन्द्र विजयवर्गीय, श्री विकास पटेल, श्रीमति रचना यादय, श्री राजकुमार काछी सहित अन्य उपस्थित रहे।
