माता लक्ष्मी जी से जुड़ी मानवसा पर्व कथा
तन- मन से उत्तम आचार- विचार ही अष्टलक्ष्मी प्राप्ति के लिए सही मार्ग माना गया है। माता महालक्ष्मी जी है जगज्जननी।
उत्तम आचार- विचार में जो लोग माँ को श्रद्धा- भक्ति- सम्मान (पूजार्चना) देते हैं, माता जी उनके तरफ खिंचती हुई खुद चली आती हैं। माता की दृष्टि में कंही भी अमीर- गरीब, जातपात, ऊंच- नीच– ये सब स्वार्थी- संकीर्णता से भरपूर भेदभाव कुछ भी नहीं दिखाई देती है।।
ओड़िआ मानवसा पर्व : श्रीक्षेत्र में “श्रिया” नाम्नी एक पवित्र आचार- विचार वाली तथाकथित नीच कुल की मगर माँ की परम भक्तिन गरीब स्त्री थी। चांद्र- मार्गशीर माह की सभी गुरुवार को प्रातः कालीन माँ लक्ष्मी जी की पूजार्चन पारम्परिक क्रम में चली आ रही थी, तो श्रिया ने भी आंतरिकता के साथ अपनी हिसाब से आरम्भ की थी। श्रिया की इस पहली लक्ष्मी- पूजन में ही माँ लक्ष्मी जी ने श्रीमन्दिर से उनकी छोटी- सी झोपडी के अंदर आकर, उनको आशीर्वाद दी थी।।
ऐसी सूंदर रोचक कहानी को संकीर्ण- जातपात- सोच से मुक्त तत्कालीन यथार्थ मानववादी श्रीक्षेत्री विष्णुभक्त समाज, एक रोचक पुराण- कथा (मानवसा पर्व– लक्ष्मी पुराण) बना लिया था, जो आजतक घर- घर में प्रचलित है। समाज में सभी श्रेणी की स्त्रियों के लिए इस मानवसा कथा के साथ, सरल में मार्गशीर- गुरुवार- ब्रत- विधान भी उपलब्ध, जिसकी मान्यता आजतक उज्जीवित है।।
इस प्रकार रोचक लक्ष्मीपुराण-
कथा के अनुसार– माता लक्ष्मी जी ऐसे श्रीमन्दिर से एक नीचकुल- जन्मा मातृ भक्तिन स्त्री “श्रिया” के घर को पधारने की कारण, श्रीमन्दिर में बड़े भाई श्रीबलराम जी अत्यंत क्रोधित हो गए थे। उनके कठोर आदेश से नाचार महाप्रभु श्रीजगन्नाथ जी के द्वारा निगृहीत होकर, माता महालक्ष्मी जी को श्रीमन्दिर से अलग होना पड़ा था। ऐसे अपमानित होकर लक्ष्मी जी चले जाने के बाद श्रीमन्दिर के साथ- साथ दोनों भाई “हतलक्ष्मी” हो गए थे।। इस देवलीला में श्रीजगन्नाथ जी और श्रीबलराम जी दोनों ही एक साथ दुःस्थ- भिक्षार्थी- स्थिति में भूखा रहकर भटकते- भटकते बहुत कष्ट भोग करने के बाद, लज्जित होकर महोदधि- तट- निवासिनी सागर- तनया लक्ष्मी जी को क्षमा मांगे और उनको यथाविधि तुष्ट कर श्रीमन्दिर को ले आएं। माता महालक्ष्मी जी अपनी मन्दिर में पुनः विराजिता होने के बाद ही हतश्री श्रीमन्दिर तथा दोनों भाई फिर पूर्व गौरवोज्ज्ल स्थिति को लौट आये थे।।
– ये एक रोचक तथा शिक्षणीय पारम्परिक पद्य- कथा, जो ओड़िआ- भाषा- साहित्य में बहुधा आदृति प्राप्त।।
