जनेकृविवि में मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन हेतु नवीन उर्वरक प्रौद्योगिकियों पर व्याख्यान

0
Spread the love

भविष्य की पीढ़ियों के लिए टिकाऊ और उत्पादक कृषि प्रणाली सुनिश्चित करने की आवश्यकता- डॉ. बिस्वास

जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के कुलपति डॉ. प्रमोद कुमार मिश्रा की प्रेरणा से मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायनशास्त्र विभाग के अंतर्गत एडवांस्ड फैकल्टी ट्रेनिंग सेंटर जबलपुर द्वारा “सतत खेती में मिट्टी के स्वास्थ्य के प्रबंधन के लिए उभरती प्रौद्योगिकियां और नवाचार” विषय पर आयोजित 21 दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण के 20वें दिन टिकाऊ कृषि और मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नईदिल्ली के प्रख्यात मृदा वैज्ञानिक डॉ. डी. आर. बिस्वास, एमेरिटस साइंटिस्ट द्वारा ‘सतत खेती में मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन हेतु नवीन उर्वरक फार्मूलेशन’ विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में मृदा उर्वरता, भूमि क्षरण तथा पोषक तत्व उपयोग दक्षता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की गई। डॉ. बिस्वास ने बताया कि एक चम्मच मिट्टी में अरबों सूक्ष्मजीव उपस्थित रहते हैं, जो मृदा को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत के पास विश्व की लगभग 2.5 प्रतिशत भूमि और 15 प्रतिशत पशुधन है, जबकि यहां विश्व की लगभग 17.5 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। इस बढ़ते दबाव के कारण भूमि संसाधनों पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। आपने मृदा पोषक तत्वों की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देश की लगभग 95 प्रतिशत मिट्टियां नाइट्रोजन की कमी से ग्रस्त हैं। उपलब्ध फॉस्फोरस एवं पोटाश की स्थिति भी अधिकांश क्षेत्रों में निम्न से मध्यम स्तर की है। साथ ही जिंक, बोरॉन एवं सल्फर जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी भी व्यापक रूप से देखी जा रही है।डॉ. बिस्वास ने बताया कि 1 किलोग्राम एनपीके उर्वरक के प्रयोग से औसतन 3.5 किलोग्राम अनाज उत्पादन प्राप्त होता है. किंतु पोषक तत्व उपयोग दक्षता अभी भी संतोषजनक नहीं है। पोटाश उपयोग दक्षता लगभग 60-70 प्रतिशत, नाइट्रोजन उपयोग दक्षता 30-50 प्रतिशत, फॉस्फोरस उपयोग दक्षता 15-20 प्रतिशत तथा सूक्ष्म पोषक तत्व उपयोग दक्षता मात्र 2-5 प्रतिशत है। समाधान के रूप में उन्होंने रॉक फॉस्फेट समृद्ध प्रस्मड कम्पोस्ट, धीमी गति से घुलने वाले उर्वरक एवं नियंत्रित विमोचन उर्वरक के उपयोग पर बल दिया। साथ ही मृदा एवं जुताई अनुसंधान तथा अवशिष्ट फॉस्फोरस के प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई। व्याख्यान के अंत में आपने किसानों, वैज्ञानिकों एवं नीति निर्माताओं से मृदा स्वास्थ्य संरक्षण को प्राथमिकता देने का आह्वान किया, ताकि भविष्य की पीढ़ियों के लिए टिकाऊ और उत्पादक कृषि प्रणाली सुनिश्चित की जा सके।इस अवसर पर विभागाध्यक्ष डॉ. बी. के. दीक्षित, डॉ.बी.एस. द्विवेदी, डॉ. जी.एस.टैगोर, डॉ. अमित उपाध्याय, डॉ. आर. के. साहू, डॉ. एफसी अमूले, डॉ. अभिषेक शर्मा, श्री प्रशांत कुर्मी, श्री मधुकर, श्रीमति संगीता ठाकुर, श्री रविन्द्र कुमार, श्री धर्मेन्द्र विजयवर्गीय, श्री विकास पटेल, श्रीमति रचना यादव, श्री राजकुमार काछी सहित प्रशिक्षाणार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed