ज्ञानवापी और काशी विश्वेश्वर

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यह ज्ञानवापी बड़ी दिव्य है इसके लिएस्कन्दपुराण के काशीखण्ड में स्वयंभगवान् विश्वनाथ कहते हैं कि,”मनुष्यों ! जो सनातन शिवज्ञान है,वेदों का ज्ञान है,वही इस कुण्ड मेंजल बनकर प्रकट हुआ है।”सन्ध्या में व कलशस्थापना में जो”आपो हि ष्ठा” आदि तीन मन्त्र प्रयुक्तहोते हैं,उनका रहस्य इस ज्ञानवापी सेही सम्बद्ध है।उनमें शिवस्वरूप,ज्ञानस्वरूप जल सेप्रार्थना है कि,हे जल ! तुम सुख देते हो, हममें ऊर्जाका आधान करते हो, हमें रमणीय शिवका दर्शन कराते हो,तुम यहाँ स्थापित हो जाओ।हे जलदेव! तुम्हारा जो सर्वोत्कृष्ट कल्याणकारक शिवस्वरूप रस है (शिवतमो रसः),हमें भी उसका उसी तरह पान कराओ जैसेमाता अपने शिशु को दुग्धपान कराती है।हे जलदेव ! तुम्हारे उस शिवस्वरूप रस कीप्राप्ति के लिए हम शीघ्र चलना चाहते हैं,जिससे तुम सारे जगत को तृप्त करते होऔर हमें उत्पन्न करते हो।यह जल काशी की ज्ञानवापी में कैसेप्रकट हुआ,यह स्कन्दपुराण में बतायागया।

काशी में एक बार ईशान(उत्तरपूर्व)दिशाके अधिपति ईशान रुद्र आए और उन्होंनेविशाल ज्योतिर्मय लिंग का दर्शन किया,असंख्य देवता ऋषि उसकी आराधना मेंलगे थे,तब ईशान के मन में इच्छा हुई इसमहालिंग का शीतल जल से अभिषेक करूँ।शिव की पूजा शिव बनकरशिव से ही की जा सकती है,शिवो भूत्वा शिवं यजेत्,यहाँ ईशान स्वयं शिव हैं,रुद्र हैं, वे ही महालिंगरूपशिव की पूजा करना चाहते हैं,उस पूजा हेतु “शिवजल” ही चाहिए,वही जल जो वेदों में #शिवतमो_रसःकहा गया है।तब ईशान ने उस जल को प्रकट करने हेतुउपर्युक्त तीन मन्त्र पढ़कर #विश्वेश्वर_लिंगसे दक्षिण में थोड़ी ही दूर पर त्रिशूल सेज्ञानकुण्ड खोदा जिसमें से ज्ञानस्वरूपपापनाशक जल प्रकट हुआ।यह_जल_ज्ञानवापी_कहलाया।यह जल सन्तों के हृदय की तरह स्वच्छ,भगवान् शिव के नाम की भाँति पवित्र,अमृत जैसा स्वादिष्ट,पापहीन और अगाध था।इस जल से ईशान ने विश्वनाथ काएक हज़ार बार अभिषेक किया। तभी बाबा विश्वनाथ ने स्वयं प्रकट होकरईशान से कहा कि यह जल स्वयं शिव है,ज्ञान स्वरूप है,अतः यह ज्ञानोद है,ज्ञानवापी है।फिर कहा इस ज्ञानवापी के जल को स्पर्शव आचमन करने से मनुष्य पापमुक्त होकरअश्वमेध व राजसूय यज्ञ का फल पाता है।ज्ञानवापी के समीप श्राद्ध करनेका वही फल है जो गयाश्राद्ध का है।ज्ञानवापी के समीप सन्ध्या करने से देशकालजनित पाप नष्ट होकर ज्ञानप्राप्ति होती है।पुराणों में महादेवजी की जो अष्ट मूर्तियाँबताई गईं हैं उनमें से जलमयी मूर्ति यहज्ञानवापी ही है।इसी के जल से शिव चार हस्तों में कलशलेकर शिव का अभिषेक करते हैं।ज्ञानवापी के जल को और शिव को जोअलग अलग समझता है वह महामूर्ख है। तस्य सुवर्णरूपस्य वापी स्नानार्थमेव या।ज्ञानवापी ज्ञानजलं ज्ञानोदं तीर्थमेव तत्॥ज्ञानं द्रवस्वरूपं च ज्ञानोदं शंकरालयम्।अस्य स्पर्शनपानाचमनस्नानोक्षणादिभिः॥भुक्तिं मुक्तिं पितृतृप्तिं यथेष्टं च फलं लभेत्।ज्ञानरूपोऽहमेवात्र द्रवमूर्ति विधाय च॥(लक्ष्मीनारायण संहिता)मेरी आत्मा सिहर जाती है कल्पना करनेपर जब मूल विश्वनाथ मन्दिर तोड़ा गयाहोगा और पण्डितों को मलेक्षों से बचानेहेतु शिवलिंग ज्ञानवापी में छिपाना पड़ाहोगा तब काशीवासियों की क्या दशा हुई होगी।पहली उस सन्ध्या में जब श्रीविहीन मन्दिरमें सन्ध्या आरती नहीं हुई होगी तब उस रातकाशी में क्या किसी के गले में निवाला उतरा होगा ? पहली उस सुबह जब प्रतिदिन दर्शन पूजनकरने वाले भक्तों ने बाबा को नहीं पाया होगातब क्या उन्हें घर लौटने का रास्ता याद रहा होगा ?क्या उस दिन गौओं को दुहा गया होगा ?क्या बछड़ों ने थनों में मुंह लगाया होगा ?गंगा घाट पर कितने नन्दियों ने उस दिन जलग्रहण किया होगा ?क्या बूढ़ी अम्माओं के हाथ अपने निजीशिवलिंग पर कनेर का फूल चढ़ाते हुएकाँपे नहीं होंगे ?क्या हाथ में पकड़े हुए तांबे के लोटे गिरनहीं गए होंगे ?क्या ब्राह्मण रुंधे कण्ठ से सस्वर रुद्रीपाठकर पा रहे होंगे ?क्या ज्ञानवापी की ओर देखते नन्दी केसमीप जाने का साहस किसी में रहा होगा ?क्या काशी के बिल्ववृक्षों में उस दिन नईकोपलें फूटी होंगी ?जैसे जैसे सूचना दूसरे नगरों में पहुँची होगी,कितने हिन्दुओं की आँखों में पानी बचा होगा ?क्या हिन्दू राजा उस दिन अपने सिंहासन परबैठे होंगे या कुशासन पर बैठकर और धिक्कारकी निःश्वास छोड़कर अश्रुओं से इष्टमन्त्रों काविनियोग किए होंगे ?क्या हुआ होगा उस दिन।हिन्दूराष्ट्र की निविड़ अंधकारमय गुह्य ऐतिह्यवेदना हर शहर में पसरी हुई थी, खण्डित देवालयअपनी कथा हिन्दूओं की दीनता में कह रहे थे।यह नगर नगर की कहानी थी,यह गाँव गाँव की कहानी थी,हर हिन्दू के पूर्वज रोये थे,मरे थे,कटे थे,गले थे,लड़े थे,तपे थे।आज उन पूर्वजों की #तपस्या पर विश्वेश्वरप्रसन्न हो रहे हैं,आज #हिन्दूराष्ट्र की पवित्रभूमि में सम्पन्न हुए यज्ञों के फल मिलने कासमय आ गया है।आज ज्ञानवापी से महालिंग प्रकट हो गयाहै जिसका अग्रभाग पूर्वकाल में विष्णु जीऔर ब्रह्माजी ने #नापने का प्रयास किया था।नीचे जो चित्र है उसपर बंगाली भाषा मेंलिखा है,”ज्ञानवापी के नीचे जो भूमि तलहै जो पाताल है।वहाँ बहुकाल से अवहेलित बैठे महाकाल हैं।”आज एक “#विष्णु” ने अपने महाकालको ढूंढ निकाला है।निखिल ब्रह्माण्डों की अनन्तानन्त शक्तियां काशीपुराधिपति भगवान् बाबा विश्वनाथ केप्रांगण में नृत्य किया करती हैं।महाप्रलयकाल के उपस्थित होने पर जबसमस्त विश्व प्रलयजल में डूब जाता है तबबाबा विश्वनाथ अपने त्रिशूल के मध्यभागपर काशी को आकाश में ऊंचा उठा देते हैं।उस समय एक मात्र काशी ही प्रकाशमानरहती है,ऐसे जगद्भासयते अखिलं बाबाविश्वनाथ को प्रणाम करता हूँ।जिन्होंने बाबा विश्वनाथ के प्रति अपराधकिया है और करेंगे,उनके पापों का फलपक गया है।क्योंकि काशी में किया हुआ पाप कहीं भी,किसी भी उपाय से नहीं छूटता।उन्हें यम यातना से भी भयंकर भैरवी यातनाभोगनी पड़ती है।यद्यपि यातना को भोगने के बाद काशी मेंजन्म लेकर मुक्त होते हैं।क्योंकि काशीश्वर विश्वनाथअत्यन्त करुणावान हैं।अभी भी इनकी शरण में जो आ जाए उसकाकल्याण है,कल्याण नहीं करवाओगे तो यहजबरन कल्याण कर देंगे जैसे अभी कर रहे हैं।काशी में मरने वाला चाहे किसी भी देवताका भक्त हो,वह कल्याण चाहता हो या नचाहता हो,काशी के महाश्मशान में शंकरजी ने कल्याण-क्षेत्र खोल रखा है,यहाँ जबरन कल्याण किया जाता है।मनुष्य ही क्या पशु,पक्षी,कीड़े,जलचर,पेड़ पौधे आदि भी काशी में शरीर त्यागतेहैं तो वे तीनों शरीरों को ज्ञानरूपी अग्नि सेभस्म करके मुक्ति पाते हैं।काशी का कण कण ज्ञानस्वरूप है।यह ब्रह्माण्ड के ज्ञान की राजधानी है।काशी में मरण मात्र से मोक्ष होता है परवहां भी भगवान शंकर सब कर्मों कोभस्म करते हैं।पास ही अवध में शिवजी के रामजी कामन्दिर बन रहा है,न यह उनसे दूर रह सकतेन वह इनसे,इसलिए आज अखिलेश्वर निखिलेश्वर सर्वेश्वरपरमेश्वर काशीश्वर बाबा विश्वेश्वर सरकार धरतीके मध्यभाग से प्रकट हो गए है।

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