नरोत्तम मिश्रा को सत्ता की तलब दिल्ली खींच ले गई या…
मोहन यादव प्रेशर में !
मप्र के मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव क्या किसी दबाव में हैं या उनके ऊपर पार्टी के भीतर से ही कोई दबाव डालने के लिए दिल्ली की परिक्रमा कर रहा है? ये सवाल आजकल भोपाल के राजनीतिक गलियारों में प्रतिध्वनित होता दिखाई दे रहा है.पिछले दिनों विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर और पूर्व गृहमंत्री डाक्टर नरोत्तम मिश्रा अचानक दिल्ली गए और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के अलावा दूसरे नेताओं से भी मिले. दावा किया गया कि नरेंद्र तोमर को हाईकमान ने तलब किया था जबकि नरोत्तम मिश्रा को सत्ता की तलब दिल्ली खींच ले गई. कयास लगाए जा रहे हैं कि पार्टी हाईकमान एक ही जिले के दो नेताओं को मुख्यमंत्री विरोधी मुहिम चलाने की वजह से दिल्ली बुलाया गया. याद रहे कि भाजपा 2003 से ही लगातार पिछडे वर्ग के लोगों को मुख्यमंत्री बनाती आ रही है इसलिए सवर्ण नेताओं में भारी असंतोष है.सूत्रों का कहना है 2023 में विधानसभा चुनाव हारने और पिछले महीने दतिया विधानसभा उपचुनाव में टिकट न मिलने के बाद बागी मुद्रा में अवतरित हुए डाक्टर नरोत्तम मिश्रा ने अभी तक हथियार नही डाले हैं. वे अभी भी पार्टी अध्यक्ष के लिए फील्डिंग के लिए तैयार हैं. उन्हे केवल आदेश का इंतजार है. इसीलिए तीन साल बाद भी वे भोपाल में सरकारी बंगले में डेरा डालकर बैठे हैं.खबर है कि पार्टी ने विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र तोमर और डाक्टर नरोत्तम मिश्रा को फिलहाल उप्र विधानसभा चुनाव के लिए खुद को तैयार रहने के संकेत दिए हैं. दोनों के भविष्य का फैसला उप्र विधानसभा चुनाव के बाद करने का आश्वासन दिया है. मजे की बात ये है कि ये दोनों सवर्ण भाजपा नेता अपनी सक्रियता से मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव की नींद उडाए हुए हैं.मप्र में इन गतिविधियों के बीच मुख्यमंत्री यादव पर मंत्रिमंडल में फेरबदल के लिए भी दबाब बनाया जा रहा है. मालवा और ग्वालियर चंबल के छत्रप सक्रिय हैं. मुख्यमंत्री पद की दौड से लगभग हट चुके हैं लेकिन वे अपने समर्थक रमेश मेंदोला को मंत्री बनवाना चाहते हैं. केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी अपने एक-दो समर्थकों को मंत्रिमंडल में शामिल कराने के लिए प्रयत्नशील हैं.मप्र में पिछले दिनों जहरीली शराब से हुई मौतों के बाद असंतुष्टों ने कहना शुरू कर दिया है कि मप्र मोहन यादव के बूते की बात नहीं. उनके कार्यकाल का यह दूसरा बडा हादसा है. इससे पहले इंदौर में दूषित पेयजल की वजह से दो दर्जन लोग मर चुके हैं. मजे की बात ये है कि ये दोनों हादसे उन इलाकों में हुए जहाँ से केंद्रीय मंत्री सिंधिया के समर्थक विधायक मंत्री हैं. सागर में गोविन्द सिंह राजपूत और इंदौर में तुलसी सिलावट का विरोध भी लगातार बढ रहा है.पार्टी सूत्रों के मुताबिक पितृपक्ष शुरू होने से पहले नेतृत्व परिवर्तन भले न हो लेकिन मप्र मंत्रिमंडल में फेरबदल तो हर हालत में हो जाएगा, इसे ज्यादा दिन तक टाला नहीं जा सकता, क्योंकि तीन साल होने को हैं, तबसे इस विस्तार को टाला जा रहा है. मंत्रिमंडल मे अभी 4 नये विधायक शामिल किए जा सकते हैं. खबर है कि सवर्णों के बढते असंतोष को शांत करना पार्टी की पहली प्राथमिकता है.गोपाल भार्गवअर्चना चिटनिस,मालिनी गौड़ और रमेश मेंदोला,बृजेंद्र सिंह यादव,शैलेंद्र जैन,प्रदीप लारिया और कमलेश शाह को मंत्री बनाया जा सकता है.गोपाल भार्गव का मामला सबसे अलग है—नौ बार के विधायक और सरकार में लंबा अनुभव। अगर भाजपा को “वरिष्ठता का सम्मान” करना हुआ तो उनका नाम सबसे ऊपर बैठता है।मालिनी गौड़ के पक्ष में इंदौर और महिला प्रतिनिधित्व का समीकरण है। वहीं अर्चना चिटनिस अनुभवी महिला चेहरा हैं और पहले भी मंत्री रह चुकी हैं।आपको याद होगा कि जुलाई में लखन पटेल से पशुपालन विभाग लेकर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने खुद अपने पास रख लिया था. मप्र में कोई स्वतंत्र गृहमंत्री और जनसंपर्क मंत्री भी नहीं है. भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल भी सरकार के मंत्रियों के कामकाज का फीडबैक लिए घूम रहे हैं. इससे मामला केवल “तीन-चार नए मंत्री कौन?” का नहीं रहा, बल्कि “किस पुराने मंत्री का विभाग बदलेगा या कौन बाहर होगा?” का भी हो गया है।अब कौन हटेगा, कौन मंत्री बनेगा ये न मुख्यमंत्री यादव जानते हैं और न प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल. अंतिम फैसला पार्टी हाईकमान को करना है.
