5,000 रुपए की रिश्वत नहीं, व्यवस्था पर उठता बड़ा सवाल

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ग्राम पंचायत लिधौरा में प्रधानमंत्री आवास योजना की अंतिम किस्त जारी करने के नाम पर कथित रूप से 5,000 रुपए की रिश्वत लेते हुए सहायक सचिव को आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) द्वारा रंगे हाथों पकड़े जाने की घटना केवल एक आपराधिक प्रकरण नहीं है। यह उस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है, जहां गरीब और जरूरतमंद नागरिक को अपना वैध अधिकार पाने के लिए भी भय, दबाव और भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करना पड़ता है।प्रधानमंत्री आवास योजना का उद्देश्य किसी गरीब परिवार को सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराना है। यदि ऐसी योजनाओं में भी लाभार्थियों से रिश्वत मांगे जाने के आरोप सामने आते हैं, तो यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि शासन की मूल भावना पर भी आघात है। जिस राशि से किसी परिवार का कई दिनों का गुजारा हो सकता है, वही राशि यदि उसके अधिकार की कीमत बन जाए, तो यह व्यवस्था की गंभीर विफलता मानी जाएगी।सरकारें डिजिटल गवर्नेंस, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) और पारदर्शी प्रशासन की बात करती हैं। निस्संदेह इन व्यवस्थाओं ने कई स्तरों पर सुधार भी किए हैं। लेकिन यह घटना बताती है कि अंतिम निर्णय या सत्यापन की प्रक्रिया जहां किसी कर्मचारी के विवेक पर निर्भर रह जाती है, वहां भ्रष्टाचार की आशंका पूरी तरह समाप्त नहीं होती। तकनीक तभी प्रभावी होगी, जब उसके साथ जवाबदेही भी उतनी ही मजबूत हो।ईओडब्ल्यू की कार्रवाई निश्चित रूप से सराहनीय है। लेकिन असली प्रश्न केवल एक आरोपी के पकड़े जाने का नहीं, बल्कि यह है कि क्या ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए संस्थागत सुधार होंगे? क्या विभागीय कार्रवाई समयबद्ध होगी? क्या दोष सिद्ध होने पर ऐसी सजा मिलेगी, जो भविष्य में किसी अन्य कर्मचारी को गरीब का हक रोकने से पहले दस बार सोचने पर मजबूर करे?यह भी स्वीकार करना होगा कि अधिकांश सरकारी कर्मचारी ईमानदारी से अपना दायित्व निभाते हैं। किंतु कुछ लोगों का आचरण पूरे तंत्र की साख पर प्रश्नचिह्न लगा देता है। इसलिए आवश्यकता किसी वर्ग विशेष को कठघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करने की है, जहां किसी भी नागरिक को अपना वैध अधिकार प्राप्त करने के लिए रिश्वत, सिफारिश या शिकायत का सहारा न लेना पड़े।हमारा मानना है कि भ्रष्टाचार केवल सरकारी धन की चोरी नहीं है; जब वह गरीब के अधिकार, उसके घर, उसकी पेंशन या उसकी आजीविका तक पहुंचने में बाधा बनता है, तब वह समाज के सबसे कमजोर वर्ग के साथ अन्याय का रूप ले लेता है। ऐसे अन्याय के प्रति शून्य सहनशीलता ही सुशासन की असली पहचान हो सकती है।

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