आंदोलन की समाप्ति किसी की जीत तो किसी की करारी हार …
छात्र जीते तो जरूर,लेकिन सरकार की समझदारी से विपक्ष औंधे मुंह धड़ाम
कुछ लोग यह सोच कर मिठाईयां बाँट रहे की एक मंत्री के स्तीफ़े से सरकार आज अस्थिर हो गई और कल गिर जाएगी । लेकिन वे सरकार की इस भूमिका को हल्के में लेने की भूल कर बैठे । शिक्षा मंत्री का स्तीफ़ा तो नैतिक जिम्मेदार सरकार को और मजबूत करने का व्यवहारिक गुण बनकर उभर सकता है क्योकि यह केवल मात्र एक स्तीफ़ा नही था बल्कि युवाओं को सरकार का साफ इशारा था की सरकार आंदोलनकारी नही अपितु उस आंदोलन में शामिल वास्तविक छात्रों के साथ खड़ी सरकार है और उनके भविष्य को लेकर गंभीर भी है।
इससे युवाओं का सरकार पर भरोशा बेहिसाब बढ़ा है। सभी ने देखा कि छात्रों को आंदोलन और उपद्रव करने उसकाया भी गया और साथ ही आंदोलन मे कुछ आपराधिक रसूक वाले अपराधी भी शामिल भी हुए । ऐसा नहीं था की केवल अपराधी ही थे लेकिन जिनको नया नेता बनने और नई राजनीतिक पार्टी बनाने की चाह थी वे भी शामिल हुए तो विपक्ष ऐसा मौका कहाँ छोड़ने वाला था उसने भी अपनी राजनैतिक रोटी सेंकने की पुरजोर कोशिश की ।
लेकिन सरकार ने उनकी मंशा को समय रहते भांप लिया और छात्रों को साधने प्रधान ने स्तीफ़े की घोषणा कर दी । आखिरकार छात्र जीते तो जरूर, लेकिन सरकार की समझदारी से विपक्ष औंधे मुंह धड़ाम हो गया ।

सरकार की सकारात्मक भूमिका –
हालांकि सरकार ने परीक्षा व्यवस्था सुधारने और अपराधियों को पकड़ने के कुछ उपाय किए, इससे जो सकारात्मक संदेश जाना था, वो गया। छात्र को साधने मे सरकार अंततः सफल भी रही । नतीजतन जो आंदोलन छात्र – छात्राओं को मोहरा बनाकर काकरोच के प्रतीक माने गए दिपके ने विनोदात्मक रूप से सोशल मीडिया पर शुरू किया था, वो हकीकत में एक डाकोसला साबित हुआ और छात्र समाज का बर्गलाने का आंदोलन बन गया। जिसमें की राजनैतिक पार्टियां और कई आपराधिक लोग भी शामिल थे जिनका शिक्षा से कोई नाता नहीं । अमूमन आम युवा में यह भावना घर कर गई कि इस देश में ऐसा विपक्ष है जो छात्रों के भविष्य की चिंता किए बगैर उन्हे आंदोलनकारी बनाने और लाठी डंडे खाने के लिए उसका रहा था । क्योंकि सरकार ने तो छात्रों की मांगे भी मानी भी और उससे पहले परीक्षा भी कराई और परिणाम भी घोषित किए ।
हाँ, यह जरूर दुखद हुआ कि सरकार की कमियों और कमजोर व्यवस्था के करण नीट परीक्षा के पेपर लीक होने से अवसाद मे कई मेधावी छात्रों ने अपनी जान गवाई थी और उसका गहन दुख उनका परिवार जीवन भर सहन करता रहेगा । जबकि सरकार जानती थी कि, पेपर लीक होने की संभावनाए रहती है क्योंकि उनकी सरकार के पहले भी पेपर लीक होने की घटनाएँ आम बात हुआ करती थी । अतः सरकार को व्यवस्था मजबूत रखनी चाहिए थी।
