वर्तमान समय में समस्याओं से जूझता देश का लोकतंत्र

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लेखक : चंद्रकांत सी पूजारी गुजरात

लोकतंत्र को विश्व की सबसे श्रेष्ठ शासन व्यवस्था माना जाता है। इसका मूल सिद्धांत है— “जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन।” लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह नागरिकों की स्वतंत्रता, समानता, न्याय, उत्तरदायित्व और सहभागिता पर आधारित एक जीवन-पद्धति भी है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जहाँ करोड़ों मतदाता नियमित रूप से अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत ने लोकतंत्र को सफलतापूर्वक बनाए रखा है तथा अनेक कठिन परिस्थितियों के बावजूद लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने का प्रयास किया है। किंतु वर्तमान समय में लोकतंत्र अनेक गंभीर चुनौतियों और समस्याओं से जूझ रहा है। यदि इन समस्याओं का समय रहते समाधान नहीं किया गया, तो लोकतंत्र की मूल भावना और जनता का उस पर विश्वास दोनों कमजोर हो सकते हैं।

लोकतंत्र का महत्व

लोकतंत्र प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार और अवसर प्रदान करता है। इसमें नागरिक अपने विचार स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर सकते हैं, सरकार की आलोचना कर सकते हैं तथा अपने प्रतिनिधियों का चुनाव कर सकते हैं। लोकतंत्र सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कानून के शासन, पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व को बढ़ावा देता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है और नागरिकों को अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का पालन करने की भी प्रेरणा मिलती है। यही कारण है कि विश्व के अधिकांश देशों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया है।

वर्तमान समय में लोकतंत्र की प्रमुख समस्याएँ

  1. राजनीति का अपराधीकरण

आज लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक राजनीति का अपराधीकरण है। अनेक ऐसे व्यक्ति चुनाव लड़ते हैं जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज होते हैं। धन और बाहुबल के कारण वे चुनाव जीत भी जाते हैं। इससे राजनीति की स्वच्छता प्रभावित होती है और जनता का लोकतंत्र पर विश्वास कम होता है।

  1. धनबल का बढ़ता प्रभाव

चुनाव लड़ना आज अत्यंत महंगा हो गया है। चुनाव प्रचार, रैलियाँ, विज्ञापन और सोशल मीडिया अभियान पर भारी धन खर्च किया जाता है। कई बार धनबल के प्रभाव से मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। इससे योग्य, ईमानदार और जनसेवा की भावना रखने वाले उम्मीदवार पीछे रह जाते हैं तथा लोकतंत्र का वास्तविक उद्देश्य प्रभावित होता है।

  1. जातिवाद और सांप्रदायिकता

लोकतंत्र में चुनाव विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और जनहित के मुद्दों पर होने चाहिए, लेकिन कई बार चुनाव जाति, धर्म और समुदाय के आधार पर लड़े जाते हैं। इससे समाज में विभाजन बढ़ता है, सामाजिक सौहार्द प्रभावित होता है तथा राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुँचता है। मतदाता भी कई बार योग्य उम्मीदवार की बजाय जातीय या धार्मिक पहचान के आधार पर मतदान कर देते हैं।

  1. भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है। सरकारी योजनाओं में अनियमितताएँ, रिश्वतखोरी, सत्ता का दुरुपयोग तथा सार्वजनिक धन का दुरुपयोग लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है। जब जनता का विश्वास शासन और प्रशासन से उठने लगता है, तब लोकतंत्र कमजोर पड़ जाता है।

  1. राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव

लोकतंत्र केवल देश में ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों के भीतर भी होना चाहिए। किंतु अनेक दलों में निर्णय कुछ चुनिंदा लोगों द्वारा लिए जाते हैं। परिवारवाद और वंशवाद के कारण योग्य एवं कर्मठ कार्यकर्ताओं को अवसर नहीं मिल पाता। इससे लोकतंत्र की भावना प्रभावित होती है तथा नई नेतृत्व क्षमता विकसित नहीं हो पाती।

  1. फर्जी समाचार और सोशल मीडिया का दुरुपयोग

डिजिटल युग में सोशल मीडिया सूचना का प्रमुख माध्यम बन चुका है। लेकिन इसके माध्यम से झूठी खबरें, अफवाहें और भ्रामक प्रचार भी तेजी से फैलते हैं। कई बार मतदाताओं को गलत जानकारी देकर प्रभावित किया जाता है। इससे लोकतांत्रिक निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित होती है और समाज में भ्रम तथा अविश्वास का वातावरण बन जाता है।

  1. मतदाता जागरूकता की कमी

लोकतंत्र की सफलता जागरूक नागरिकों पर निर्भर करती है। अनेक मतदाता उम्मीदवारों की योग्यता, कार्यक्षमता और नीतियों का मूल्यांकन किए बिना मतदान कर देते हैं। कुछ लोग मतदान करने भी नहीं जाते। इससे लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित होती है तथा योग्य नेतृत्व के चयन पर भी असर पड़ता है।

  1. संसद और विधानसभाओं की कार्यप्रणाली

लोकतांत्रिक संस्थाओं का उद्देश्य स्वस्थ बहस, नीति निर्माण और जनहित के विषयों पर गंभीर चर्चा करना है। किंतु कई बार संसद और विधानसभाओं में हंगामा, व्यवधान और राजनीतिक टकराव अधिक देखने को मिलता है। इससे महत्वपूर्ण विधेयकों तथा जनहित के मुद्दों पर सार्थक चर्चा नहीं हो पाती और जनता की अपेक्षाएँ अधूरी रह जाती हैं।

  1. बेरोजगारी और आर्थिक असमानता

लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब नागरिकों को समान अवसर मिलें। बढ़ती बेरोजगारी, गरीबी और आर्थिक असमानता लोकतंत्र के सामने बड़ी चुनौती हैं। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग कई बार अपने अधिकारों का प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं कर पाता, जिससे लोकतंत्र की समावेशी भावना प्रभावित होती है।

  1. संस्थाओं की स्वतंत्रता पर प्रश्न

लोकतंत्र में न्यायपालिका, चुनाव आयोग, मीडिया तथा अन्य संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और स्वतंत्रता अत्यंत आवश्यक है। यदि इन संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठने लगें, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रभावित होती है और जनता का विश्वास कमजोर पड़ने लगता है।

एक महत्वपूर्ण उदाहरण

कुछ वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों में किसानों, विद्यार्थियों, कर्मचारियों तथा अन्य सामाजिक वर्गों द्वारा अपनी विभिन्न मांगों को लेकर बड़े स्तर पर आंदोलन और प्रदर्शन किए गए। शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र का संवैधानिक अधिकार है, किंतु जब संवाद के स्थान पर टकराव, हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति की क्षति या लंबे समय तक गतिरोध की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, तब उसका प्रतिकूल प्रभाव आम नागरिकों, अर्थव्यवस्था तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी पड़ता है। यह उदाहरण दर्शाता है कि लोकतंत्र की सफलता केवल अधिकारों के प्रयोग में नहीं, बल्कि सरकार और नागरिकों के बीच निरंतर संवाद, संवैधानिक मर्यादा और पारस्परिक विश्वास बनाए रखने में भी निहित है।

भारतीय लोकतंत्र की उपलब्धियाँ

इन चुनौतियों के बावजूद भारतीय लोकतंत्र ने अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ भी हासिल की हैं। नियमित चुनाव, शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन, स्वतंत्र न्यायपालिका, सक्रिय मीडिया, सूचना का अधिकार, पंचायती राज व्यवस्था तथा नागरिकों की बढ़ती भागीदारी भारतीय लोकतंत्र की बड़ी शक्तियाँ हैं। भारत ने विविधता में एकता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लोकतांत्रिक परंपराओं को निरंतर आगे बढ़ाया है। विश्व के अनेक देशों के लिए भारत का लोकतंत्र आज भी प्रेरणा का स्रोत माना जाता है।

लोकतंत्र को मजबूत बनाने के उपाय

वर्तमान समस्याओं का समाधान सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। इसके लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं—

  • राजनीति में स्वच्छ और ईमानदार लोगों की भागीदारी बढ़ाई जाए।
  • चुनावी खर्च पर प्रभावी नियंत्रण रखा जाए।
  • अपराधी पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों पर कठोर कार्रवाई हो।
  • मतदाता शिक्षा और जागरूकता अभियान व्यापक स्तर पर चलाए जाएँ।
  • राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र को बढ़ावा दिया जाए।
  • भ्रष्टाचार के विरुद्ध सख्त, निष्पक्ष और पारदर्शी कार्रवाई हो।
  • सोशल मीडिया पर फर्जी समाचारों और भ्रामक सूचनाओं पर प्रभावी नियंत्रण किया जाए।
  • संसद और विधानसभाओं की कार्यवाही को अधिक उत्तरदायी, अनुशासित एवं प्रभावी बनाया जाए।
  • शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और आर्थिक समानता पर विशेष ध्यान दिया जाए।
  • लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता को हर परिस्थिति में सुरक्षित रखा जाए।
  • नागरिकों में संविधान के प्रति सम्मान, कर्तव्यबोध और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूकता विकसित की जाए।

निष्कर्ष

लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं, बल्कि नागरिकों की सक्रिय भागीदारी, नैतिक मूल्यों और संवैधानिक आदर्शों पर आधारित व्यवस्था है। वर्तमान समय में लोकतंत्र अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जैसे भ्रष्टाचार, अपराधीकरण, धनबल, जातिवाद, सांप्रदायिकता, फर्जी समाचार, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता तथा राजनीतिक असहिष्णुता। इन समस्याओं का समाधान केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का भी कर्तव्य है।

जब मतदाता जागरूक होंगे, राजनीतिक दल जवाबदेह होंगे, संस्थाएँ निष्पक्ष रहेंगी, मीडिया अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वहन करेगा तथा नागरिक संविधान के मूल्यों का सम्मान करेंगे, तभी लोकतंत्र वास्तव में मजबूत होगा। इसलिए आवश्यक है कि हम लोकतंत्र को केवल मतदान तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने व्यवहार, विचार और सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग बनाएँ। एक सशक्त लोकतंत्र वही है जहाँ अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी समान रूप से पालन किया जाए। तभी भारत का लोकतंत्र और अधिक सशक्त, समावेशी, उत्तरदायी तथा विश्व के लिए आदर्श बन सकेगा।

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