सरकार अशिक्षित मजदूरों की फौज तैयार कर रही है?
आज सवाल बेहद गंभीर है।12 साल पहले उद्योग जगत सरकार से आखिर क्या चाहता था?क्या उसे और इंजीनियर चाहिए थे? क्या उसे और एमबीए चाहिए थे? क्या उसे और विशेषज्ञ चाहिए थे?या फिर उसे चाहिए थी ऐसी सस्ती श्रमशक्ति, जो कम मजदूरी पर लंबे समय तक काम करती रहे?एक वायरल दावे में कहा जा रहा है कि उद्योग जगत की जरूरत के हिसाब से ऐसी शिक्षा व्यवस्था तैयार की गई, जिससे आने वाले 40 वर्षों में 50 करोड़ अशिक्षित या कम-कुशल मजदूरों की फौज तैयार हो सके, जिन्हें 200 से 300 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी पर काम कराया जा सके।अगर यह दावा सही है, तो यह सिर्फ शिक्षा का सवाल नहीं है—यह देश के भविष्य का सवाल है।सरकारी स्कूलों की हालत पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी है। कहीं एक शिक्षक को कई कक्षाओं की जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है। शिक्षकों को चुनाव, जनगणना और दूसरे गैर-शैक्षणिक सरकारी कामों में भी लगाया जाता है।सवाल यह है—जब सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के लिए पर्याप्त शिक्षक ही नहीं होंगे, तो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों का भविष्य क्या होगा?क्या देश को ज्ञान और कौशल आधारित अर्थव्यवस्था बनाना है?या फिर ऐसी अर्थव्यवस्था, जिसमें करोड़ों लोग कम मजदूरी पर काम करने को मजबूर हों? यहाँ एक और गंभीर सवाल है—क्या शिक्षा नीति और उद्योग जगत की जरूरतों के बीच कोई ऐसा संबंध है, जिस पर देश में खुली बहस होनी चाहिए?सरकार कहती है कि वह कौशल, रोजगार और शिक्षा को मजबूत कर रही है।लेकिन जमीन पर सरकारी स्कूलों की स्थिति, शिक्षकों की संख्या और शिक्षा पर होने वाला खर्च क्या तस्वीर पेश करता है?इस पूरे दावे की निष्पक्ष जांच जरूरी है।क्योंकि 50 करोड़ बच्चों और युवाओं के भविष्य से जुड़ा सवाल है।दुनिया के तमाम देशों की शिक्षा प्रणाली देश के भविष्य को ध्यान में रखकर बनाई जाती है. उद्योगपतियों की सलाह से नहीं. आज दुनिया में जितने भी देश विज्ञानं और तकनीक के मामले में आगे हैं वहां श्रमिक मिलना कठिन है.. श्रमशक्ति है भी तो बहुत मंहगी. लेकिन भारत वैज्ञानिक, तकनीशियन नहीं मजदूर पैदा करने में लगी है. दुख की बात ये है कि सरकार स्थिति भी स्पष्ट नही कर रही. सरकार हर महत्वपूर्ण मुद्दे को वंदेमातरम में लपेटकर फारिग हो जाती है.आपको बता दूं कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में व्यावसायिक और कौशल शिक्षा को बहुत बड़ा स्थान दिया गया है.नीति का लक्ष्य था कि कम-से-कम 50 फीसदी विद्यार्थियों कोवोकेशनल शिक्षा मिले. स्कूलों को आईटीआई, पोलिटेकनिक,और स्थानीय उद्योगों से जोड़ने की बात भी स्पष्ट रूप से कही गई है.सरकार ने पहले ही कहा था कि स्किल इंडिया का उद्देश्य उद्योगों की जरूरत के अनुसार कुशल श्रमिक ” तैयार करना है. स्किल विकास विभाग में उद्योग-आधारित स्किल परिषद भी बनाए गए हैं.यहीं से आपका सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है:क्या शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ उद्योगों को कुशल कर्मचारी उपलब्ध कराना है, या ऐसे स्वतंत्र नागरिक तैयार करना भी है जो सवाल पूछ सकें, शोध कर सकें, नए विचार पैदा कर सकें और सत्ता तथा उद्योग—दोनों से असहमति जता सकें? यह जरूर प्रमाणित है कि उद्योग को नीति के कौशल वाले हिस्से में औपचारिक भूमिका दी गई है। मसलन, सरकार के अनुसार फिक्की, एसोचेम, सीआईआई, नेस्काम और सेक्टर स्किल काउंसिल के साथ विमर्श किए गए और स्किल पाठ्यक्रम को औद्योगिक जरुरत के अनुरूप बनाने की बात कही गई. मै मानता हूँ कि “शिक्षा और रोजगार के बीच संबंध जरूरी है, लेकिन अगर शिक्षा का पाठ्यक्रम उद्योग की तत्काल जरूरतों के अनुसार ढलने लगे, तो शिक्षा नागरिक और चिंतक बनाने के बजाय केवल श्रम-बाजार के लिए मानव संसाधन तैयार करने का माध्यम बन सकती है।” सबसे धारदार सवाल यही है कि“नई शिक्षा नीति में विद्यार्थी नागरिक बनेगा, चिंतक बनेगा और रोजगार पैदा करने वाला उद्यमी बनेगा—या उद्योग की जरूरत के मुताबिक प्रशिक्षित कर्मचारी?”
आलेख – राकेश अचल
