श्रीजगन्नाथ और पारम्परिक घोषयात्रा

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दैतापति विश्वावसु के मदद से मन्दिर को महोदधि से उस तैरता हुआ दारू (लकड़ी के तने) आने के बाद, हजारों शिल्पकारों ने विष्णु भगवान का विग्रह बनाने का प्रयत्न किया; किन्तु वह सब दारू के ऊपर एक छिद्र भी न कर सकें। तब विश्वकर्मा जी रूप बदल कर बूढ़े वर्द्धकी की रूप में प्रकट हुए और कहा कि– “राजा इन्द्रद्युम्न! हम 21 दिनों में आपका उद्देश्य पूर्ण कर देंगे; किन्तु इस इक्कीश दिनों के पहले हमारे गम्भीरा (कक्ष) में कोई भी प्रवेश नहीं करेगा।।”

पहले- पहले सब कुछ ठीक चल रहा था किंतु अपनी उत्सुकता और रानी गुंडिचा देवी के आकुलता पर राजा ने 15वां दिन ही उस कक्ष को खोलकर अंदर में प्रवेश किया। देखा कि, उस बूढ़े वर्द्धकी रूपी विश्वकर्मा जी तो अदृश्य हो गए, सामने हाथ- पैर हीन दारूब्रह्म रूपी श्रीजगन्नाथ, उनके बड़े भाई श्रीबलभद्र और लाडली बहन जी सुभद्रा के अधूरे विग्रह विराजमान थे।यह देखकर घोर निराशा और पश्चाताप से पीड़ित राजा और रानी विलाप करने लगे।। ऐसी दयनीय स्थिति में एक दिन नारद जी ने प्रकट होकर कहा– “राजन, आप दोनों पति- पत्नी शोक नही करना चाहिए; अपितु प्रसन्न होने की समय आ गया है। आप दोनों की असीम भक्ति तथा पुण्यबल के कारण अब से पृथ्वी वासियों को त्रिमूर्त्ति- भगवान के दुर्लभ रूप का दर्शन सम्भव होगा। राजन, श्री विष्णु भगवान ने यह रूप द्वारिका- वासियों तथा ब्रह्मा जी को दिखाया था, जो अब समस्त संसार वासियों के लिए सुलभ होंगे और प्रमाणिक विग्रह के रूप से सहस्रों वर्षों तक विराजमान रहेगें।।” तब राजा- रानी संतुष्ट होकर, मित्र दैतापति विश्वावसु तथा ब्राह्मण मंत्री विद्यापति जी को मन्दिर अर्पण कर, इसके साथ दारूब्रह्म त्रिमूर्त्तियों की सेवा- पूजा दायित्व भी प्रदान किया था। समय बीतने लगा और सहस्रों साल बाद, राजा द्वितीय इंद्रद्युम्न ने इस मंदिर को श्रीमन्दिर (बड़देउल) में रूपान्तरित किया, जो सामने है।। श्री जगन्नाथ जी का आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया में ये विश्व प्रसिद्ध “रथयात्रा” और फिर चातुर्मासिक अशुद्धि काल से पहले शुक्ल पक्ष दशमी तिथि में “बाहूडा यात्रा” बहुत पुरानी समय से आजतक पारम्परिक क्रम में मनाया जाता है।। रथयात्रा (घोषयात्रा) में सम्मिलित तीनों रथ के बारे में संक्षिप्त रूप से कुछ विशेष जानकारियां; यथा–

(१)श्री जगन्नाथ जी :

1. रथ का नाम– नंदीघोष रथ,2. कुल काष्ठ खंडो की संख्या– 832,3. कुल चक्के– 16,4. रथ की ऊंचाई– 45 फीट,5. रथ की लंबाई चौड़ाई– 34 फ़ीट 6 इंच,6. रथ के सारथि का नाम– दारुक,7. रथ के रक्षक का नाम– गरुड़,8. रथ में लगे रस्से का नाम– शंखचूड़ नागीन,9. पताके का रंग– त्रैलोक्य मोहिनी,10. रथ के घोड़ो के नाम– वराह, गोवर्धन, कृष्णा, गोपीकृष्णा, नृसिंह, राम, नारायण, त्रिविक्रम, हनुमान, रूद्र।।

(२)श्री शुभद्रा जी :

1. रथ का नाम– देवदलन रथ,2. कुल काष्ठ खंडो की संख्या– 593,3. कुल चक्के–12,4. रथ की ऊंचाई– 43 फीट,5. रथ की लंबाई चौड़ाई– 31 फ़ीट 6 इंच,6. रथ के सारथि का नाम– अर्जुन,7. रथ के रक्षक नाम– जयदुर्गा,8. रथ में लगे रस्से का नाम– स्वर्णचूड़ नागीन,9. पताके का रंग– नदंबिका,10. रथ के घोड़ो के नाम– रुचिका, मोचिका, जीत, अपराजिता।।

(३)श्रीबलभद्र जी :

1. रथ का नाम– तालध्वज रथ,2. कुल काष्ठ खंडो की संख्या– 763,3. कुल चक्के– 14,4. रथ की ऊंचाई– 44 फीट,5. रथ की लंबाई चौड़ाई– 33 फ़ीट,6. रथ के सारथि का नाम– मातली,7. रथ के रक्षक का नाम– वासुदेव,8. रथ में लगे रस्से का नाम– वासुकि नाग,9. पताके का रंग– उन्नानी,10. रथ के घोड़ो के नाम– तीव्र, घोर, दीर्घाश्रम, स्वर्णनाभ।।

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