वैदिक राखी – “रक्षा सूत्र”

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वैदिक राखी – “रक्षा_सूत्र” कहलाती है ‘मौली’ या कलावा मौली का अर्थ : ‘मौली’ का शाब्दिक अर्थ है ‘सबसे ऊपर’। मौली का तात्पर्य सिर से भी है। मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं।

इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है। मौली के भी प्रकार हैं। शंकर भगवान के सिर पर चन्द्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता है।रक्षासूत्र_का_मंत्र_है – ‘येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल: Iतेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल: IIइस मंत्र का सामान्यत: यह अर्थ लिया जाता है कि दानवों के महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूं। हे रक्षे!(रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। धर्मशास्त्र के विद्वानों के अनुसार इसका अर्थ यह है कि रक्षा सूत्र बांधते समय ब्राह्मण या पुरोहत अपने यजमान को कहता है कि जिस रक्षासूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बलि धर्म के बंधन में बांधे गए थे अर्थात् धर्म में प्रयुक्त किए गये थे, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं, यानी धर्म के लिए प्रतिबद्ध करता हूं। इसके बाद पुरोहित रक्षा सूत्र से कहता है कि हे रक्षे तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना। इस प्रकार रक्षा सूत्र का उद्देश्य ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमानों को धर्म के लिए प्रेरित एवं प्रयुक्त करना है।शास्त्रों में कहा गया है – इस दिन अपरान्ह में रक्षासूत्र का पूजन करे और उसके उपरांत रक्षाबंधन का विधान है। यह रक्षाबंधन राजा को पुरोहित द्वारा यजमान के ब्राह्मण द्वारा, भाई के बहिन द्वारा और पति के पत्नी द्वारा दाहिनी कलाई पर किया जाता है। संस्कृत की उक्ति के अनुसार -जनेन विधिना यस्तु रक्षाबंधनमाचरेत । स सर्वदोष रहित, सुखी संवतसरे भवेत् ।।अर्थात् – इस प्रकार विधिपूर्वक जिसके रक्षाबंधन किया जाता है वह संपूर्ण दोषों से दूर रहकर संपूर्ण वर्ष सुखी रहता है। रक्षाबंधन में मूलत: दो भावनाएं काम करती रही हैं। प्रथम जिस व्यक्ति के रक्षाबंधन किया जाता है उसकी कल्याण कामना और दूसरे रक्षाबंधन करने वाले के प्रति स्नेह भावना। इस प्रकार रक्षाबंधन वास्तव में स्नेह, शांति और रक्षा का बंधन है। इसमें सबके सुख और कल्याण की भावना निहित है। सूत्र का अर्थ धागा भी होता है और सिद्धांत या मंत्र भी। पुराणों में देवताओं या ऋषियों द्वारा जिस रक्षासूत्र बांधने की बात की गई हैं वह धागे की बजाय कोई मंत्र या गुप्त सूत्र भी हो सकता है। धागा केवल उसका प्रतीक है।रक्षासूत्र बाँधते समय एक श्लोक और पढ़ा जाता है जो इस प्रकार है -ओम यदाबध्नन्दाक्षायणा हिरण्यं, शतानीकाय सुमनस्यमाना: । तन्मSआबध्नामि शतशारदाय, आयुष्मांजरदृष्टिर्यथासम् ।।#वैदिक_रक्षा_सूत्रबनाने_की_विधि :-*******************************इसके लिए ५वस्तुओं की आवश्यकता होती है –(१) दूर्वा (घास) (२)अक्षत (चावल) (३) केसर (४) चन्दन (५) सरसों के दाने ।इन ५ वस्तुओं को रेशम के कपड़े में लेकर उसे बांधदें या सिलाई कर दें, फिर उसे कलावा में पिरो दें, इस प्रकारवैदिक राखी तैयार हो जाएगी ।इन पांच वस्तुओंका महत्त्व :–(१) दूर्वा – जिसप्रकार दूर्वा का एक अंकुर बो देने पर तेज़ी से फैलता है औरहज़ारों की संख्या में उग जाता है, उसीप्रकार मेरे भाई का वंश और उसमे सदगुणों का विकास तेज़ी से हो । सदाचार, मन कीपवित्रता तीव्रता से बदता जाए । दूर्वा, गणेश जी को प्रिय है अर्थात हम जिसे राखी बाँधरहे हैं, उनके जीवन में विघ्नों का नाश हो जाए ।(२) अक्षत – हमारीगुरुदेव के प्रति श्रद्धा कभी क्षत-विक्षत ना हो सदा अक्षतरहे ।(३) केसर – केसर कीप्रकृति तेज़ होती है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, वहतेजस्वी हो । उनके जीवन में आध्यात्मिकता का तेज, भक्ति कातेज कभी कम ना हो ।(४) चन्दन – चन्दनकी प्रकृति तेज होती है और यह सुगंध देता है । उसी प्रकारउनके जीवन में शीतलता बनी रहे, कभीमानसिक तनाव ना हो । साथ ही उनके जीवन में परोपकार, सदाचार और संयम की सुगंध फैलती रहे ।(५) सरसों के दाने- सरसों की प्रकृति तीक्ष्ण होती है अर्थात इससे यह संकेतमिलता है कि समाज के दुर्गुणों को, कंटकों कोसमाप्त करने में हम तीक्ष्ण बनें।इस प्रकार इन पांचवस्तुओं से बनी हुई एक राखी को सर्वप्रथम गुरुदेव केश्री-चित्र पर अर्पित करें । फिर बहनें अपने भाईको, माता अपने बच्चों को, दादीअपने पोते को शुभ संकल्प करके बांधे । इस प्रकार इन पांचवस्तुओं से बनी हुई वैदिक राखी को शास्त्रोक्त नियमानुसार बांधते हैं हम पुत्र-पौत्र एवं बंधुजनों सहितवर्ष भर सूखी रहते हैं ।महाभारत में यहरक्षा सूत्र माता कुंती ने अपने पोते अभिमन्यु को बाँधी थी । जब तक यह धागा अभिमन्यु के हाथ में था तब तक उसकीरक्षा हुई, धागा टूटने परअभिमन्यु की मृत्यु हुई ।भगवान विष्णु ने वामन अवतार में असुरों के राजा बलि की अमरता के लिए उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था। तब से इस संकल्प सूत्र को रक्षा सूत्र के तौर पर बांधा जाने लगा। अपने पति की रक्षा के लिए माता लक्ष्मी ने भी राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधा था, तब से इसे रक्षा बंधन का भी प्रतीक माना जाने लगा।रक्षा सूत्र बांधते समय ये श्लोक बोलें –येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रोमहाबलः ।तेन त्वाम रक्षबध्नामि, रक्षे माचल माचल: ||चावल लगाने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है““““““““““““““““““““““““““““““`शास्त्रों के अनुसार, चावल को हविष्य यानी हवन में देवताओं को चढ़ाया जाने वाला शुद्ध अन्न माना जाता है। कच्चे चावल का तिलक में प्रयोग सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाला होता है। चावल से हमारे आसपास की नकारात्मक ऊर्जा सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है।भाई-बहन का पवित्र पर्व रक्षा बंधन मंगलमयी हो और इस पर्व को मनाते समय कोई भूल-चूक न हो, इसके लिए हमें कुछ पारंपरिक बातों का ध्यान रखना चाहिए।तिलक पर चावल लगाने के संदर्भ में मान्यता यह है कि चावल अत्यंत शुद्ध और शुभ अनाज है…अगर पूजा में भी कोई वस्तु कम रह जाए तो प्रतीकात्मक रुप से उस वस्तु के स्थान पर चावल रख दिए जाते हैं….भाई को लगने वाला तिलक हर दृष्टि से शुभ हो,हर शुभ भावनाएं और तरंगे उसके लिए सौभाग्य लेकर आए इसलिए तिलक पर चावल लगाने का रिवाज है…Iमौली बांधने के नियम :-““““““““““““““““`i) पुरूषों और जिन लड़कियों की शादी नहीं हुई है उन्हें कलावा दायें हाथो मे बांधते हैं। ii) विवाहित स्त्रियों के बाएं हाथ में कलावा बांधते हैं। iii) जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हो उसकी मुट्ठी बंद हाेनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए। iv) मौली कहीं भी बांधे लेकिन इस बात का ध्यान रहें कि इस रक्षा सूत्र को सिर्फ तीन बार बांधे। कैसी होती है मौली? : मौली कच्चे धागे (सूत) से बनाई जाती है जिसमें मूलत: 3 रंग के धागे होते हैं- लाल, पीला और हरा, लेकिन कभी-कभी यह 5 धागों की भी बनती है जिसमें नीला और सफेद भी होता है। 3 और 5 का मतलब कभी त्रिदेव के नाम की, तो कभी पंचदेव।कहां-कहां बांधते हैं मौली? : मौली को हाथ की कलाई, गले और कमर में बांधा जाता है। इसके अलावा मन्नत के लिए किसी देवी-देवता के स्थान पर भी बांधा जाता है और जब मन्नत पूरी हो जाती है तो इसे खोल दिया जाता है। इसे घर में लाई गई नई वस्तु को भी बांधा जाता और इसे पशुओं को भी बांधा जाता है।कब बांधी जाती है मौली? :i) पर्व-त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है।ii) हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें।iii) प्रतिवर्ष की संक्रांति के दिन, यज्ञ की शुरुआत में, कोई इच्छित कार्य के प्रारंभ में, मांगलिक कार्य, विवाह आदि हिन्दू संस्कारों के दौरान मौली बांधी जाती है।मौली को धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। iv) किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी बांधते हैं।v) किसी देवी या देवता के मंदिर में मन्नत के लिए भी बांधते हैं।vi) मौली बांधने के 3 कारण हैं- पहला आध्यात्मिक, दूसरा चिकित्सीय और तीसरा मनोवैज्ञानिक।vii) किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे।* हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उद्घाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार आदि के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली बांधी जाती है।viii) इसके अलावा पालतू पशुओं में हमारे गाय, बैल और भैंस को भी पड़वा, गोवर्धन और होली के दिन मौली बांधी जाती है।#संकटों_से_रक्षा_करती_है_मौली :- “““““““““““““““““““““`मौली करती है रक्षा : मौली को कलाई में बांधने पर कलावा या उप मणिबंध करते हैं। हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं। भाग्य व जीवनरेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है। इन मणिबंधों के नाम शिव, विष्णु व ब्रह्मा हैं। इसी तरह शक्ति, लक्ष्मी व सरस्वती का भी यहां साक्षात वास रहता है। जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढ़कर कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिशक्तियों को समर्पित हो जाता है जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की सब प्रकार से रक्षा होती है। इस रक्षा-सूत्र को संकल्पपूर्वक बांधने से व्यक्ति पर मारण, मोहन, विद्वेषण, उच्चाटन, भूत-प्रेत और जादू-टोने का असर नहीं होता।मौली बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा है।**************************************मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं। इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है। मौली बांधने के 3 कारण हैं – पहला आध्यात्मिक, दूसरा चिकित्सीय और तीसरा मनोवैज्ञानिक। हालांकि आज मौली, कलावा और राखी के स्वरूप में फर्क है। आओ जानते हैं इसे बांधे जाने के 10 प्रमुख कारण।1. किसी की रक्षा हेतु : सबसे पहले इंद्र की पत्नी शचि ने वृत्तसुर से युद्ध में इंद्र की रक्षा के लिए रक्षा सूत्र बांधा था। इसलिए जब भी कोई युद्ध में जाता है तो उसकी कलाई पर कलाया, मौली या रक्षा सूत्र बांधकर उसकी पूजा की जाती है।2. किसी को वचन देने हेतु : असुरों के दानवीर राजा बलि ने दान देने से पूर्व यज्ञ में रक्षा सूत्र बांधा था और फिर जब दान में तीन पग भूमि दे दी तक प्रसन्न होकर उसकी अमरता के लिए भगवान वामन ने उसकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधकर उसे उसकी रक्षा करने का वचन दिया और सदा उसके पास रहने का वचन दिया था।3. भाई बहन का एक दूसरे की रक्षा हेतु बंधन : इसे रक्षाबंधन का भी प्रतीक माना जाता है, ‍जबकि देवी लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथों में अपने पति की रक्षा के लिए यह बंधन बांधा था और अपने पति को अपने साथ ले गई थी।4. मन्नत के लिए : मौली को मन्नत के लिए किसी देवी-देवता के स्थान पर भी बांधा जाता है और जब मन्नत पूरी हो जाती है तो इसे खोल दिया जाता है।5. सभी की रक्षा हेतु : इसे घर में लाई गई नई वस्तु को भी बांधा जाता और इसे पशुओं को भी बांधा जाता है। इसके अलावा पालतू पशुओं में हमारे गाय, बैल और भैंस को भी पड़वा, गोवर्धन और होली के दिन मौली बांधी जाती है।6. किसी शुभ कार्य की शुरुआत हेतु : किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे। किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी भी मौली बांधते हैं।7. प्रत्येक धार्मिक क्रिया कर्म में : हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उद्घाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार, मांगलिक कार्य, आदि के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली बांधी जाती है।8. मौली करती है रक्षा : मौली को कलाई में बांधने पर कलावा या उप मणिबंध करते हैं। हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं। भाग्य व जीवनरेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है।इन मणिबंधों के नाम शिव, विष्णु व ब्रह्मा हैं। इसी तरह शक्ति, लक्ष्मी व सरस्वती का भी यहां साक्षात वास रहता है। जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढ़कर कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिशक्तियों को समर्पित हो जाता है जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की सब प्रकार से रक्षा होती है। इस रक्षा-सूत्र को संकल्पपूर्वक बांधने से व्यक्ति पर मारण, मोहन, विद्वेषण, उच्चाटन, भूत-प्रेत और जादू-टोने का असर नहीं होता।शास्त्रों का ऐसा मत है कि मौली बांधने से त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति, विष्णु की कृपा से रक्षा तथा शिव की कृपा से दुर्गुणों का नाश होता है। इसी प्रकार लक्ष्मी से धन, दुर्गा से शक्ति एवं सरस्वती की कृपा से बुद्धि प्राप्त होती है। यह मौली किसी देवी या देवता के नाम पर भी बांधी जाती है जिससे संकटों और विपत्तियों से व्यक्ति की रक्षा होती है। यह मंदिरों में मन्नत के लिए भी बांधी जाती है।इसमें संकल्प निहित होता है। मौली बांधकर किए गए संकल्प का उल्लंघन करना अनुचित और संकट में डालने वाला सिद्ध हो सकता है। यदि आपने किसी देवी या देवता के नाम की यह मौली बांधी है तो उसकी पवित्रता का ध्यान रखना भी जरूरी हो जाता है। कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती है। बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती है। यह काला धागा भी होता है। इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते।9. सेहत के लिए मौली : प्राचीनकाल से ही कलाई, पैर, कमर और गले में भी मौली बांधे जाने की परंपरा के ‍चिकित्सीय लाभ भी हैं। शरीर विज्ञान के अनुसार इससे त्रिदोष अर्थात वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है। पुराने वैद्य और घर-परिवार के बुजुर्ग लोग हाथ, कमर, गले व पैर के अंगूठे में मौली का उपयोग करते थे, जो शरीर के लिए लाभकारी था। ब्लड प्रेशर, हार्टअटैक, डायबिटीज और लकवा जैसे रोगों से बचाव के लिए मौली बांधना हितकर बताया गया है।शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है अतः यहां मौली बांधने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। उसकी ऊर्जा का ज्यादा क्षय नहीं होता है। शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर के कई प्रमुख अंगों तक पहुंचने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती हैं। कलाई पर कलावा बांधने से इन नसों की क्रिया नियंत्रित रहती है। कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती है। बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती है। यह काला धागा भी होता है। इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते।10. मनोवैज्ञानिक लाभ : मौली बांधने से उसके पवित्र और शक्तिशाली बंधन होने का अहसास होता रहता है और इससे मन में शांति और पवित्रता बनी रहती है। व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में बुरे विचार नहीं आते और वह गलत रास्तों पर नहीं भटकता है। कई मौकों पर इससे व्यक्ति गलत कार्य करने से बच जाता है।

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