सचमुच अब विरासत बोल रही है!
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ जारी प्रदर्शन पर अब बयानबाजी बढ़ने लगी है। अब बहुजन आघाडी के प्रमुख प्रकाश आंबेडकर ने इसपर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए प्रदर्शनकारियों को आड़े हाथों लिया है. उन्होंने कहा कि दिल्ली में हो रहे ‘आरक्षण विरोधी’ प्रदर्शन तथाकथित उच्च जातियों की अपनी वर्चस्व बचाने की एक नग्न कोशिश को बेनकाब करता है.सामयिक मुद्दों पर बोलने वाले आजादी के पुरोधाओं के वंशजों में बोलने वाले प्रकाश अंबेडकर अकेले नहीं है.प्रकाश आंबेडकर अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर एक पोस्ट के जरिए ये बातें कहीं हैं. उन्होंने इस प्रदर्शन को अजा, अजजा और पिछडे वर्गों के सामाजिक न्याय के खिलाफ करार दिया और कहा कि प्रदर्शनकारियों ने जाति प्रथा की रक्षा करने के लिए बेशर्मी से अपनी ऊंची जाति की पहचान को सबसे आगे रखा है. प्रकाश की ही तरह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के वशंज हैं तुषार गांधी. वे भी जब तब बोलते रहते हैं. गांधी की विरासत की राजनीतिक व्याख्यातुषार गांधी लगातार नागरिक स्वतंत्रता, सांप्रदायिक सद्भाव और विरोध के लोकतांत्रिक अधिकार जैसे मुद्दों पर बोलते हैं। हाल में उन्होंने केरल में छात्र प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामले वापस लेने की अपील की। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर है—तुषार गांधी महात्मा गांधी के विचारों के संवाहक हो सकते हैं, गांधीजी के राजनीतिक उत्तराधिकारी नहीं। गांधीजी की हत्या के बाद उनकी कोई राजनीतिक पार्टी या संवैधानिक पद उनके परिवार के नाम नहीं हुआ। इसलिए उनकी बात का मूल्य वंश से ज्यादा तर्क और गांधीवादी विचारों से तय होना चाहिए।पिछले दिनों सरकार और भाजपा द्वारा शुरु किए गये विवाद में ‘वंदे मातरम्’ के रचनाकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के वंशज सुमित्रो चट्टोपाध्याय, जो बंकिमचंद्र के वंशज और भाजपा विधायक हैं, ने सोनिया गांधी से ‘वंदे मातरम्’ विवाद पर माफी मांगने की मांग की. उनका इस विवाद में बोलना इसलिए खबर बन गया क्योंकि वे सीधे उस ऐतिहासिक विरासत से जुडेदिखाई देते है।सजल चट्टोपाध्याय ने प्रधानमंत्री मोदी के रुख का समर्थन किया था। यहाँ सवाल उठता है—क्या बंकिमचंद्र के वंशज होने से ‘वंदे मातरम्’ की व्याख्या करने का विशेष संवैधानिक अधिकार मिल जाता है? नहीं। उनकी पारिवारिक निकटता उन्हें एक विशेष ऐतिहासिक आवाज जरूर देती है, लेकिन अंतिम प्रामाणिकता इतिहास, मूल पाठ और संविधान से आएगी।और नेताजी सुभाष चंद बोस का परिवार सबसे दिलचस्प उदाहरण है।उनके वंशज कभी भाजपा में रहते हुए भी पार्टी और संघ के खिलाफ ऐसी बातें कही थीं जो उनकी अपनी पार्टी की लाइन से अलग थीं। 2023 में उन्होंने कहा था कि विभाजनकारी कट्टर संगठनों को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए और संघ को राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। 2026 में वे बंगाल की एस आई आर प्रक्रिया के भी वे आलोचक रहे और बाद में भाजपा छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में गए; अगस्त में उन्होंने तृणमूल भी छोड़ दी थी.इससे एक बात स्पष्ट होती है—वंशज होना व्यक्ति को किसी एक राजनीतिक खेमे में स्थायी रूप से बाँधता नहीं है।तो क्या जनता इनकी सुनती है?यहीं सबसे महत्वपूर्ण बात है।जनता इनके नाम को सुनती है, लेकिन जरूरी नहीं कि इनकी बात मानती भी हो।गांधी के प्रपौत्र बोलते हैं तो मीडिया इसलिए सुनता है क्योंकि नाम के पीछे गांधी हैं।बंकिम के वंशज बोलते हैं तो ‘वंदे मातरम्’ के कारण खबर बनती है।नेताजी के परिवार का व्यक्ति बोलता है तो नेताजी की विरासत स्वतः चर्चा में आ जाती है।लेकिन लोकतंत्र में वंशावली वोट नहीं होती।आज अगर तुषार गांधी कोई बात कहते हैं तो सामने वाला पूछ सकता है—“आपकी बात का गांधीजी के विचारों से क्या संबंध है?”बंकिम के वंशज से पूछा जा सकता है—“आपके पूर्वज के मूल विचार क्या थे?”और नेताजी के परिवार से पूछा जा सकता है—“आपका राजनीतिक तर्क क्या है?”यही स्वस्थ लोकतंत्र है।लेकिन इनकी आवाज को पूरी तरह शिगूफेबाजी कहना भी गलत होगाक्योंकि विरासत का एक नैतिक और प्रतीकात्मक मूल्य होता है।कल्पना कीजिए—अगर कोई सामान्य व्यक्ति ‘वंदे मातरम्’ पर,,, टिप्पणी करता है, उसकी खबर शायद एक दिन चलती है। लेकिन उसी विषय पर बंकिमचंद्र के वंशज बोलें तो इतिहास अचानक वर्तमान से जुड़ जाता है।इसी तरह गांधी के परिवार का कोई व्यक्ति अहिंसा, सांप्रदायिक सद्भाव या नागरिक स्वतंत्रता पर बोले तो उसकी बात में ऐतिहासिक संदर्भ जुड़ जाता है। कभी कभी लगता है कि विरासत आवाज देती है।कभी लगता है तर्क विश्वसनीयता देता है।और कभी जनसमर्थन भी राजनीतिक प्रभाव देता है।इनमें केवल पहला मौजूद हो तो वह वंशगत प्रतिष्ठा है।पहले दो हों तो वह सार्थक सार्वजनिक हस्तक्षेप है।तीनों हों तो वह राजनीतिक शक्ति बन जाता है।और अभी इन परिवारों के अधिकांश लोगों के मामले में मुझे तीसरी स्थिति नहीं दिखाई देती।इसलिए यदि मैं कहूँ तो—ये लोग “शिगूफेबाज” मात्र नहीं हैं, लेकिन इनके बयानों को सिर्फ इसलिए अंतिम सत्य मान लेना भी ठीक नहीं कि इनके दादा-परदादा महान नेता थे।सबसे खूबसूरत लोकतांत्रिक कसौटी यही है:“विरासत आपका परिचय हो सकती है, आपकी बात का प्रमाण नहीं।
खास लेखन -श्री राकेश अचल
