15 वर्षीय सिख छात्र अर्जुनवीर सिंह ने रचा इतिहास, संस्कृत के क्षेत्र में सम्मान पाने वाले पहले सिख युवा बने
विश्व संस्कृत दिवस पर किया गया सम्मानित
परंपरा, प्रतिभा और युवा संकल्प के प्रेरणादायक संगम का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कक्षा 11वीं के छात्र अर्जुनवीर सिंह ने संस्कृत के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। संस्कृत के अध्ययन, शोध एवं प्रचार-प्रसार के प्रति अपने असाधारण समर्पण के लिए सम्मानित होने वाले पहले सिख युवा के रूप में उन्होंने एक नई मिसाल कायम की है।संस्कृत दिवस के अवसर पर श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट द्वारा अर्जुनवीर सिंह को संस्कृत के प्रति उनकी विशिष्ट सेवाओं और शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए उपलब्धि पुरस्कार एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।महज 15 वर्ष की आयु में अर्जुनवीर ने अकादमिक जगत में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है। देवनागरी लिपि पर उनके शोध-पत्र का प्रकाशन प्रतिष्ठित International Journal of Language and Literature Sciences में हो चुका है। उनके शोध कार्य को स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और कोलंबिया विश्वविद्यालय के विद्वानों द्वारा भी सराहा गया है।भारतीय ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, साहित्य और प्राचीन परंपराओं के प्रति अर्जुनवीर की गहरी रुचि एवं निरंतर अध्ययन को देखते हुए ट्रस्ट ने उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया।ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत रोहित शास्त्री ने अर्जुनवीर की उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ते देखना गौरव का विषय है।उन्होंने कहा, “संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा, दर्शन, साहित्य और आध्यात्मिक विरासत की आधारशिला है। आज के आधुनिक युग में अर्जुनवीर जैसे युवा का संस्कृत को अध्ययन और शोध का विषय बनाना अत्यंत सराहनीय एवं प्रेरणादायक है।”महंत रोहित शास्त्री ने आगे कहा, “अर्जुनवीर का समर्पण निश्चित रूप से अनेक युवाओं को अपनी संस्कृति, विरासत और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ने के लिए प्रेरित करेगा। उनकी यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती और भारतीय संस्कृति से जुड़ने का अधिकार एवं दायित्व हर युवा का है।”सम्मान प्राप्त करने के बाद भावुक एवं प्रसन्न अर्जुनवीर सिंह ने महंत रोहित शास्त्री को अपना ‘द्रोणाचार्य’ बताते हुए कहा कि जब वह कक्षा 5वीं में पढ़ते थे, तब महंत रोहित शास्त्री द्वारा प्रस्तुत संस्कृत की पुस्तकों ने उनके मन में इस प्राचीन भाषा के प्रति गहरी रुचि और जिज्ञासा उत्पन्न की।अर्जुनवीर सिंह ने कहा, “यह सम्मान मेरे लिए केवल गौरव और प्रेरणा का विषय नहीं है, बल्कि संस्कृत के अध्ययन एवं शोध को और अधिक समर्पण के साथ आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी है।”उन्होंने कहा, “संस्कृत ने मुझे भारतीय संस्कृति, दर्शन और सनातन ज्ञान परंपरा को समझने का एक नया दृष्टिकोण दिया है। मेरा प्रयास रहेगा कि इस ज्ञान को निरंतर सीखूं, शोध के माध्यम से आगे बढ़ाऊं और अधिक से अधिक युवाओं को भारतीय ज्ञान परंपरा से परिचित कराने में अपना योगदान दूं।”अर्जुनवीर सिंह की यह उपलब्धि न केवल उनके परिवार और शिक्षकों के लिए गौरव का विषय है, बल्कि उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराओं को समझने और संरक्षित करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट ने युवा विद्वान अर्जुनवीर सिंह को उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए हार्दिक बधाई दी और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। ट्रस्ट ने युवाओं से आह्वान किया कि वे संस्कृत, भारतीय संस्कृति और देश की समृद्ध ज्ञान परंपरा के अध्ययन के लिए आगे आएं और अपनी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाएं।
