नालंदा की राख में दबा सत्य !
जिस बौद्ध विश्वविद्यालय के वैद्याचार्य ने तुर्की आक्रान्ता बख्तियार खिलजी को जीवनदान दिया — उसी नीच ने उसी विश्वविद्यालय को आग लगाकर भस्म कर दिया।
तुर्की भारतवर्ष का कभी भी मित्र राष्ट्र नहीं रहा।
हाँ, उसके साथ व्यापारिक संबंध अवश्य रहे होंगे, परंतु हमारी संस्कृति को सबसे गहरे घावों में से कई तुर्कों ने भी दिए हैं।
ईस्वी संवत् 1193 में बख्तियार खिलजी ने भारत पर आक्रमण किया।
उस समय भारत में बौद्ध धर्म का भी पर्याप्त प्रभाव था, और अनेक बौद्ध भिक्षु, सनातन हिन्दू दशनामी संन्यासियों के साथ घुलमिल गए थे।
क्योंकि दोनों की रहन-सहन, वेशभूषा तथा वैराग्य एक समान प्रतीत होता था, अतः इन्हें “काशी लामा” भी कहा जाता था।
आज भी महानिर्वाणी अखाड़े में उनकी एक “लामा मढ़ी” विद्यमान है।
● उस काल में नालंदा विश्वविद्यालय अपने चरम वैभव पर था। वहाँ बौद्ध दर्शन के साथ-साथ समस्त आस्तिक एवं नास्तिक दर्शनों का अध्ययन होता था।
मैंने स्वयं भी अपने आचार्यों से नास्तिक दर्शन पढ़ा है।
उस विश्वविद्यालय में 10,000 से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत थे, और दूर-दूर देशों से विद्यार्थी वहाँ शिक्षा हेतु आते थे।
यह उस काल का एकमात्र विश्वविद्यालय था जहाँ छात्रावास, सभागृह, स्नानगृह तथा विहार आदि पूर्ण रूप से उपलब्ध थे।
लगभग 2000 शिक्षक छात्रों को शिक्षा प्रदान करते थे।
जब बख्तियार खिलजी एक असाध्य रोग से पीड़ित हो गया और उसकी जीवन-रक्षा की कोई आशा न रही, तब नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेदाचार्य, वैद्य राहुल श्रीभद्र ने उसे आरोग्य प्रदान किया।
वे अत्यंत उच्चकोटि के चिकित्सक थे — उस काल में उनसे श्रेष्ठ उपचारक मिलना कठिन था।
परंतु जब खिलजी स्वस्थ हो गया — उस दुष्टात्मा ने न केवल उन्हें धन्यवाद नहीं दिया, अपितु यह बात उसके मूढ़ मन को कष्टप्रद लगी कि वह एक “काफ़िर वैद्य” से ठीक हुआ।
उसने आयुर्वेद चिकित्सा की श्रेष्ठता को अपमान का कारण माना।
उसे भय था कि यदि यह चिकित्सा पद्धति संसार में प्रतिष्ठित हो गई, तो इस्लामी प्रभुत्व पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा।
अतः उसने नालंदा विश्वविद्यालय के वैद्याचार्य, शिक्षकों, विद्यार्थियों और सामान्य जनों तक को लूट लिया, मार डाला, और उस ज्ञान की पुण्यस्थली को आग में भस्म कर दिया।
● उस आग में हमारी बेशकीमती पुस्तकें, जिनमें लगभग २० फैकल्टियाँ समाहित थीं, जलकर नष्ट हो गईं।
कहा जाता है — उस विशाल पुस्तकालय की अग्नि तीन माह तक प्रज्वलित रही।
उस दुराचारी ने केवल विश्वविद्यालय नहीं जलाया — उसने हमारी संस्कृति, सभ्यता और ज्ञान-परंपरा की धरोहर को ही भस्म कर दिया।
इसके पश्चात बौद्ध भिक्षु अत्यंत दुःखी हो उठे।
वे अन्ततः इस्लामी आक्रमणों से त्रस्त होकर तिब्बत की ओर पलायन कर गए।
● इस्लाम ने भारत को घाव दिए हैं — और दुर्भाग्यवश वह क्रम आज भी पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ है।
