पाम आयल आज के खाद्य उद्योग का एक अनिवार्य हिस्सा , लेकिन इसको लेकर वैज्ञानिक और आयुर्वेदाचार्य दोनों चिंतित
पाम आयल (पाम तेल) आज के खाद्य उद्योग का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया है, लेकिन इसके स्वास्थ्य पर प्रभाव को लेकर वैज्ञानिक समुदाय और आयुर्वेदाचार्य दोनों ही चिंतित हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण:
विज्ञान पाम आयल को दो श्रेणियों में बांटता है: कच्चा (रेड पाम ऑयल) और रिफाइंड (प्रोसेस्ड)। रिफाइंड पाम आयल में संतृप्त वसा की मात्रा लगभग 50% होती है, जो एलडीएल (खराब कोलेस्ट्रॉल) को बढ़ाती है। इससे धमनियों में प्लाक जमता है, जिससे हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। सबसे गंभीर चिंता ‘पाम ऑयल ऑक्सीडेशन’ की है। रिफाइनिंग के दौरान 200°C से अधिक ताप पर इसमें ग्लाइसिडिल फैटी एसिड एस्टर (GE) और 3-MCPD जैसे टॉक्सिक कंपाउंड बनते हैं। ये कार्सिनोजेनिक (कैंसरकारी) होते हैं और किडनी व रिप्रोडक्टिव सिस्टम को नुकसान पहुंचाते हैं। यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण (EFSA) ने इसे ‘संभावित खतरनाक’ घोषित किया है। इसके अलावा, पाम आयल में ओमेगा-6 और ओमेगा-3 का अनुपात असंतुलित (लगभग 46:1) है। यह असंतुलन शरीर में सूजन (Inflammation) को बढ़ाता है, जो मोटापा, डायबिटीज टाइप-2 और ऑटोइम्यून बीमारियों की जड़ है। हालांकि, कच्चे पाम आयल में विटामिन-ए (कैरोटीनॉयड) और टोकोट्रिएनॉल (विटामिन-ई का शक्तिशाली रूप) होता है, पर रिफाइनिंग से ये नष्ट हो जाते हैं, और केवल खतरनाक ट्रांस-फैट ही बचता है।
आयुर्वेदिक दृष्टिकोण:
आयुर्वेद में पाम आयल का कोई शास्त्रीय उल्लेख नहीं है, क्योंकि यह विदेशी वृक्ष (#अफ्रीकी मूल) है। आयुर्वेद इसे ‘अभ्यास्य’ (दैनिक उपयोग योग्य) नहीं मानता। इसके गुण: यह ‘गुरु’ (भारी), ‘स्निग्ध’ (चिकना) और ‘उष्ण’ (गर्म) है, जो #कफ और पित्त दोनों को बढ़ाता है – एक विरोधाभासी स्थिति जिसे ‘संग’ (अवरोध) कहते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, पाम आयल ‘विषम’ (असंतुलित) अग्नि (पाचन अग्नि) उत्पन्न करता है। यह ‘#आम’ (विषैला अपाच्य पदार्थ) का निर्माण करता है, जो सूक्ष्म चैनलों (स्रोतस) में चिपक जाता है। यही ‘आम’ हृदय-धमनियों (हृदय वाहिनियों) में रुकावट डालता है, जिसे आयुर्वेद ‘हृदय-वरण’ कहता है – यह आधुनिक एथेरोस्क्लेरोसिस का ही आयुर्वेदिक नाम है।
चरक संहिता में कहा गया है कि जो तेल पाचन के बाद ‘मधुर’ (मीठा) विपाक देता है, वह बलकारक होता है, लेकिन पाम आयल ‘कटु’ (तीखा) विपाक देता है, जो वात को तो शांत करता है, पर कफ-पित्त को प्रकोपित करता है। यह ‘मेद’ (वसा ऊतक) को बढ़ाकर ‘स्थौल्य’ (मोटापा) और ‘प्रमेह’ (मधुमेह) को निमंत्रण देता है। आयुर्वेद में सरसों, तिल, नारियल या घी को वरीयता दी जाती है, क्योंकि ये प्राकृतिक, अप्रोसेस्ड और दोष-संतुलक होते हैं।
तुलनात्मक निष्कर्ष:
दोनों विज्ञान इस बात पर सहमत हैं कि रिफाइंड पाम आयल हानिकारक है। विज्ञान इसके कैमिकल टॉक्सिन्स (GE, 3-MCPD) और कोलेस्ट्रॉल प्रभाव पर जोर देता है, जबकि आयुर्वेद इसके ‘आम’ निर्माण और दोष असंतुलन पर। दोनों ही मोटापा, हृदय रोग और डायबिटीज को इसका दीर्घकालिक परिणाम बताते हैं।
एकमात्र अपवाद कच्चा (वर्जिन) पाम आयल है, जिसमें एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, लेकिन यह बाजार में दुर्लभ है। भारत में अधिकांश पाम आयल ‘रिफाइंड, ब्लीच्ड और डिओडोराइज्ड’ (RBD) होता है, जो सबसे खतरनाक श्रेणी है।
आयुर्वेद कहता है, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” – सभी सुखी हों, इसलिए जैविक घी, नारियल तेल या सरसों तेल का उपयोग करें। विज्ञान कहता है कि पाम आयल युक्त प्रोसेस्ड फूड (#बिस्कुट, #चॉकलेट, #नमकीन) को पूरी तरह टालें। यदि अनिवार्य हो, तो दैनिक सेवन 10 ग्राम (2 चम्मच) से अधिक न करें और हरी सब्जियों व फलों का सेवन बढ़ाकर इसके ऑक्सीडेटिव प्रभाव को कम करें। स्वास्थ्य ही सच्चा धन है – बुद्धिमानी से चुनें।
