देश के सीजेआई के विरोध का मतलब !
हैदराबाद की एन ए एल एस ए आर यूनिवर्सिटी के नव स्नातक छात्रों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध किया है. छात्रों ने उन्होंने कुलपति और प्रशासन को पत्र लिखकर इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है.छात्रों का आरोप है कि मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ने युवाओं को ‘कॉकरोच’ कहने और पुलिस बर्बरता के वीडियो देखने का समय न होने जैसे असंवेदनशील वक्तव्य दिए हैं. छात्रों के अनुसार, ऐसे व्यक्ति के हाथों से अपनी अहम डिग्री प्राप्त करना उनके लिए शैक्षणिक और भावनात्मक रूप से सही नहीं है.नवस्नायकों छात्रों ने इसे संवैधानिक जवाबदेही के मूल्यों के खिलाफ भी बताया है.विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से छात्रों की मांग पर अभी कोई कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन ये तय है कि यदि माननीय दीक्षांत समारोह में जाते हैं तो माहौल भारी तो रहेगा. हमारे यहाँ कहावत है कि -‘बोया पेड बबूल का, तो आम कहाँ से होय?’. न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने युवाओं को कोकरोच कहकर गलती से बबूल ही बोया, हालांकि उन्होंने बाद में सफा भी दी. किंतु जैसे कमान से निकला तीर, बंदूक से निकली गोली वापस नहीं आती वैसे ही न्यायमूर्ति के मुँह से निकला बोल वचन वापस नहीं आया. आज देश में कोकरोच जनता पार्टी सरकारों की बुनिया हिलाती दिखाई दे रही है. युवा, बेरोजगार अब अलग मुद्दों पर संगठित होकर सरकार से जबाभदेही मांग रहे हैं.बात देश के मुख्य न्यायाधीश की है. देश का प्रधानमंत्री भले ही कोई चाय बेचने वाला बन जाए किंतु मुख्य न्यायाधीश बनने के लिए आवश्यक अहर्ता चाहिए. कोलेजियम सिस्टम से गुजरना पडता है. जस्टिस सूर्यकांत जी भी ऐसे ही मुख्य न्यायाधीश नहीं बन गए,किंतु उनके मुँह से निकले एक शब्द ने सब गुड ही गोबर कर दिया.अब रायता पूरी तरह से फैल चुका है बच्चे सडकों पर और उनके सामने सरकार घुटनों पर है. सरकार संसद से मुँह छिपाती फिर रही है. देश संसद में प्रधानमंत्री की एक झलक पाने के लिए बेताब है और प्रधानमंत्री अपने हनूमान सहित गायब हैं.मेरी स्मृति मे ऐसा मंजर कभी नहीं देखा.अब जस्टिस सूर्यकांत के लिए देश का माहौल बदल चुका है। अब हर सार्वजनिक कार्यक्रम में विरोध की आशंका लगने लगी है। यही वजह है कि एक बाद एक उनके कार्यक्रम रद्द हो रहे हैं। पहले जस्टिस एच.आर. खन्ना मेमोरियल लेक्चर रद्द हुआ। ये 28 जुलाई 2026 को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में होना था. जस्टिस सूर्यकांत मुख्य अतिथि थे। लेकिन आयोजकों ने कुछ दिन पहले ही इसे स्थगित कर दिया.फिर मुंबई। टी आई एस एस का 86वां दीक्षांत समारोह 2 अगस्त को होना थ. मुख्य न्यायाधीश मुख्य अतिथि थे.सिर्फ दो दिन पहले “अनपेक्षित परिस्थितियों” का हवाला देकर स्थगित कर दिया गया.छात्र बताते हैं—सैकड़ों छात्र और उनके परिवार पहले से आ चुके थे। पैसे डूबे.मुख्य न्यायाधीश के मुख्य आतिथ्य का विरोध दुर्भाग्यपूर्ण है. छात्रों को बालहठ छोड देना चाहिए. किसी दूसरे हाथ से उपाधि लेने से बेहतर है कि मुख्य न्यायाधीश से उपाधि ले ली जाए. कम से कम उनकी अपनी उपाधि, पद तो प्रामाणिक है. मुझे लगता है कि जस्टिस सू्र्यकांत अपनी करनी पर मन ही मन पछताते होंगे. इसलिए उन्हे अब बख्श देना ही ठीक होगा. मुमकिन है कि भविष्य में किसी भी उच्च पद पर बैठा कोई व्यक्ति वाणी का संयम न खोए.आपको याद होगा कि सीजेआई की टिप्पणियों और निर्णयों से केवल छात्र ही नहीं वकील भी आहत हैं. यूपी के एक वकील सीजेआई के इजलास में गाली का इस्तेमाल कर चुके हैं. वरिष्ठ वककील प्रशांत भूषण भी सीजेआई की टिप्पणी को अलोकतांत्रिक कह चुके हैं. अब इन सबको तडीपार तो नहीं किया जा सकता।
आलेख -राकेश अचल
