एग्जिट पोल सिर्फ एक आकर्षक टाइम पास,दर्शकों की भावनाओं को साधने के लिए परोसा जाता है

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एग्जिट पोल केवल आंकड़ों का विश्लेषण नहीं है, ये एक तरह का नैरेटिव भी बनाते हैं

भारतीय चुनावी लोकतंत्र में एग्जिट पोल अब एक स्थायी इवेंट बन चुका है। लोगों को इस पल का बेसब्री से इंतजार रहता है। मतदान खत्म होते ही लोग टीवी स्क्रीन और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर रिजल्ट देखने बैठ जाते हैं। जबकि सबको पता होता है कि एग्जिट पोल के रिजल्ट सही होने के चांस फिफ्टी-फिफ्टी ही होते हैं। सीटों के अनुमान और वोट प्रतिशत की गणना के साथ शुरू हो जाता है, सरकार बनने-बिगड़ने के दावे। पर सवाल वही पुराना है कि अगर एग्जिट पोल सचमुच विश्वसनीय नहीं हैं तो यह लोगों को आकर्षित क्यों करता है। तो क्या यह सिर्फ एक आकर्षक टाइम पास है, जिसे दर्शकों की भावनाओं को साधने के लिए परोसा जाता है? 2004 के लोकसभा चुनाव में ज्यादातर पोल एनडीए की जीत बता रहे थे, लेकिन यूपीए सत्ता में आई। 2021 के बंगाल चुनाव में एग्जिट पोल टीएमसी-बीजेपी में कांटे की टक्कर दिखा रहे थे, लेकिन ममता बनर्जी की पार्टी ने भारी बहुमत हासिल किया। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी कई एग्जिट पोल एनडीए को 350 से अधिक सीटें दे रहे थे, वास्तव में क्या हुआ हम सभी ने देखा।

दरअसल, कई बार एग्जिट पोल के अनुमान चौंकाने वाली सटीकता के साथ नतीजों के करीब पहुंच जाते हैं, तो कई बार पूरी तरह उलट साबित होते हैं। यही अनिश्चितता इसे एक दिलचस्प लेकिन संदिग्ध औजार बनाती है। कुछ लोग एग्जिट पोल को गणित से ज्यादा मनोविज्ञान का खेल भी मानते हैं। बुधवार को आए एग्जिट पोल से इस द्वंद्व को ठीक से समझ सकते हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा के लिए कुछ पोल्स में टीएमसी को हारते हुए दिखाया गया, जबकि अन्य पोल्स में वही पार्टी रिकॉर्ड तोड़ जीत दर्ज करती नजर आती है। एक ही चुनाव, एक ही मतदाता, लेकिन नतीजों के अनुमान बिल्कुल विपरीत। यह विरोधाभास एग्जिट पोल की सीमाओं को उजागर करता है। इसी तरह तमिलनाडु में एक्सिस माई इंडिया का सर्वे अभिनेता विजय की पार्टी को बहुमत में दिखा रहा है जबकि अधिकांश अन्य एग्जिट पोल इस संभावना को खारिज करते नजर आ रहे।

इस तरह आम मतदाता के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि किस पर भरोसा किया जाए और किसे महज अटकल मानकर छोड़ दिया जाए। असल में, एग्जिट पोल केवल आंकड़ों का विश्लेषण नहीं है, ये एक तरह का नैरेटिव भी बनाते हैं। मानव स्वभाव भी इस खेल में बड़ी भूमिका निभाता है। हम वही सुनना चाहते हैं जो हमारे विश्वासों और पसंद के अनुकूल हो। अपने पसंदीदा दल या नेता को हारते हुए देखना मन को स्वीकार्य नहीं होता इसलिए जब एग्जिट पोल हमारे पक्ष में आते हैं, तो हम उन्हें सच मान लेते हैं और जब विपरीत होते हैं, तो उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने लगते हैं । हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि एग्जिट पोल पूरी तरह निरर्थक हैं। बस देखने का नजरिया ये होना चाहिए कि एग्जिट पोल एक संभावित परिदृश्य है न कि अंतिम परिणाम, इसलिए एग्जिट पोल को टाइम पास ही समझिए।

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