आध्यात्मिक जगत !
3D render of a female in yoga pose on rock in ocean against a sunset sky
आध्यात्मिक जगत का मतलब होता है--आत्मसत्ता में प्रवेश। कोई भी साधना हो, चाहे वह योग की हो या हो तंत्र की--भौतिक जगत से शुरू होती है और पारलौकिक जगत का अतिक्रमण करती हुई आध्यात्मिक जगत में प्रविष्ट होती है। मुख्य रूप से तीन ही जगत हैं--भौतिक जगत, पारलौकिक जगत और आध्यात्मिक जगत। इन्हीं तीनों में सारा ब्रह्माण्ड समाया हुआ है। साधना-भूमि में सर्वप्रथम भौतिक जगत का अतिक्रमण होता है जिसके परिणामस्वरूप समस्त इन्द्रियों से मन का सम्बन्ध समाप्त हो जाता है।
जैसा कि हम सब भली- भांति जानते हैं कि मनुष्य शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ और पांच कर्मेन्द्रियाँ होती हैं। मन उनका अधिष्ठाता है। अर्थात् मन अपना कार्य इन्हीं इन्द्रियों की सहायता से कर पाता है।स्थूल शरीर में यदि इन्द्रियां मन का साथ न दें तो मन व्यर्थ हो जाता है, उसकी व्यर्थता तब समझ में आती है जब स्थूल शरीर छूट जाता है। मन इस नयी परिस्थिति में व्याकुल हो जाता है। क्योंकि मन के भीतर हज़ारों साल के वही संस्कार विद्यमान हैं और मन उनका आदी रहता है।
मनुष्य जब मृत्यु को प्राप्त होता है तो उसका स्थूल शरीर जिसमें समस्त इन्द्रियां विद्यमान रहती है, छूट जाता है। अब उसे जीवित अवस्था की तरह भूख लगती है, प्यास लगती है और काम-वासना सताती है। इस विकट अवस्था में मृत व्यक्ति का मन व्याकुल होकर इधर-उधर भटकता है पर उसे कहीं कोई राहत नहीं मिलती, कहीं कोई सहारा नहीं मिलता है क्योंकि मन की इन्द्रियां उसके पास उपस्थिति नहीं होती हैं। उस व्याकुल, पागल स्थिति मन वाला मृत व्यक्ति वासना के प्रबल वेग के फलस्वरूप ही प्रेत शरीर को उपलब्ध होता है।
भौतिक जगत में जब व्यक्ति भौतिक शरीर से साधना करता है तो सर्वप्रथम भैतिक जगत का ही अतिक्रमण होता है। इसका फल यह होता है कि साधक के मन का सम्बन्ध इन्द्रियों से समाप्त हो जाता है। साधना का प्रथम लाभ या उद्देश्य है मन की मनमानी कम करना, मन को क्षीण करना। मन का उसकी इन्द्रियों से सम्बन्ध विच्छेद करना।
इसके बाद साधना में परलौकिक जगत का अतिक्रमण होता है। इसके परिणामस्वरूप बुद्धि से मन का सम्बन्ध टूट जाता है। यहाँ यह समझने की बात है कि कोई व्यक्ति जब कोई भी कार्य करने को उद्यत होता है तो सर्वप्रथम उसे कार्य के सफल होने के लिए संकल्प लेना होता है। बिना संकल्प किये कार्य शुरू करने पर असफलता ही हाथ लगती है। संकल्प में मनुष्य का बुद्धि तत्व कार्य करता है। बुद्धि अच्छा क्या है, बुरा क्या है ? --इसका विवेक जगाती है। अच्छा करने के लिए प्रेरित करती है और बुरा करने से रोकती है। उसको इस तरह समझा जा सकता है कि मनुष्य ने संकल्प किया कि वह प्रतिदिन मन्दिर भगवान के दर्शन करने जायेगा तभी अपना दैनिक कार्य शुरू करेगा। लेकिन जब वह घर से बाहर निकला तो रास्ते में मदिरा की दुकान मिल गयी और उसका मन भटकने लगा। फल यह हुआ कि वह निकला था मंदिर जाने के लिए और मन ने उसे मदिरालय पहुंचा दिया। यदि हमने संकल्प कर रखा है तो बुद्धि मन की लगाम कस कर रखेगी। हमारे मदिरालय की ओर उठने वाले कदम वह रोक देगी। तो जब पारलौकिक जगत का अतिक्रमण होता है तो बुद्धि से मन का सम्बन्ध भी टूट जाता है।
साधना के तीसरे चरण में साधक का प्रवेश आत्म-जगत में होता है जिसकी उपलब्धि है--मन और आत्मा का सम्बन्ध भंग होना। साधक को अपनी आत्मा का बोध मन के साथ सम्बन्ध भंग होने पर ही होता है और यह आत्म-बोध जिस वातावरण में, जिस स्थिति में होता है, वह है--अध्यात्म। मगर आद्यात्म जगत में प्रवेश के मार्ग में इन्द्रियां, मन और बुद्धि बाधक हैं। इन तीन बाधाओं का निवारण आवश्यक है। यह तभी सम्भव है जब हम तीनों के अस्तित्व का अलग-अलग बोध करें। साधारणतया हम तीनों का बोध एक साथ करते हैं। अलग-अलग बोध होना अति कठिन कार्य है। इसी कठिन कार्य को करने के उपाय को साधना कहते हैं।
